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Atharvaveda - Mantra 25

Atharvaveda 13/2/25

4 Sukta
46 Mantra
13/2/25
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- ककुम्मत्यास्तारपङ्क्तिः Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
रोहि॑तो दिव॒मारु॑ह॒त्तप॑सा तप॒स्वी। स योनि॒मैति॒ स उ॑ जायते॒ पुनः॒ स दे॒वाना॒मधि॑पतिर्बभूव ॥

रोहि॑त: । दिव॑म् । आ । अ॒रु॒ह॒त् । तप॑सा । त॒प॒स्वी । स: । योनि॑म् । आ । ए॒ति॒ । स: । ऊं॒ इति॑ । जा॒य॒ते॒ । पुन॑: । स: । दे॒वाना॑म् । अधि॑ऽपति: । ब॒भू॒व॒ ॥२.२५॥

Mantra without Swara
रोहितो दिवमारुहत्तपसा तपस्वी। स योनिमैति स उ जायते पुनः स देवानामधिपतिर्बभूव ॥

रोहित: । दिवम् । आ । अरुहत् । तपसा । तपस्वी । स: । योनिम् । आ । एति । स: । ऊं इति । जायते । पुन: । स: । देवानाम् । अधिऽपति: । बभूव ॥२.२५॥

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Meaning
१. (रोहित:) = प्रभु की उपासना से अपना वर्धन करनेवाला (तपस्वी) = तपोमय जीवनवाला साधक (तपसा) = तप के द्वारा (दिवं आरुहत्) = प्रकाशमय ब्रह्मलोक में-मोक्ष में आरोहरण करता है। मोक्षप्राप्ति के लिए तपस्या अत्यन्त आवश्यक है। भोगप्रधान जीवन के साथ मोक्ष का सम्बन्ध नहीं है। (सः) = वह तपस्वी (योनिम् आ एति) = अपने घर [ब्रह्मलोक] को सब प्रकार से प्राप्त होता है। इस घर में परान्तकाल तक निवास करके (स:) = वह (उ) = निश्चय से (पुन: जायते) = पुनः जन्म लेता है, शरीरधारण करके इस लोक में आता है। २. (स:) = वह (देवानां अधिपतिः बभूव) = दिव्यगुणों का स्वामी होता है। यह मोक्ष से लौटनेवाला व्यक्ति उत्तम दिव्यगुणसम्पन्न जीवनवाला होता है। स्वर्गच्युत व्यक्तियों के जीवन में 'दान-प्रसंग, मधुरवाणी, देवार्चन तथा ब्राह्मण-तर्पण' आदि उत्तम गुणों की स्थिति होती है। (स्वर्गच्युतानामिह भूमिलोके चत्वारि चिहानि वसन्ति देहे। दानप्रसको मधुरा च वाणी सुरार्चनं ब्रह्म तर्पणं च॥)|
Essence
हम तपस्या के द्वारा उन्नत होते हुए मोक्ष प्राप्त करते हैं। परान्तकाल के पश्चात् पुनः यहाँ जन्म लेते हैं। उस समय हमारी वृत्ति दिव्यगुणसम्पन्न होती है।

 
Subject
मोक्ष से पुनरावृत्ति