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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 13/2/15

4 Sukta
46 Mantra
13/2/15
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
तं समा॑प्नोति जू॒तिभि॒स्ततो॒ नाप॑ चिकित्सति। तेना॒मृत॑स्य भ॒क्षं दे॒वानां॒ नाव॑ रुन्धते ॥

तम् । सम् । आ॒प्नो॒ति॒ । जू॒तिऽभि॑: । तत॑: । न । अप॑ । चि॒कि॒त्स॒ति॒ । तेन॑ । अ॒मृत॑स्य । भ॒क्षम् । दे॒वाना॑म् । न । अव॑ । रु॒न्ध॒ते॒ ॥2.१५॥

Mantra without Swara
तं समाप्नोति जूतिभिस्ततो नाप चिकित्सति। तेनामृतस्य भक्षं देवानां नाव रुन्धते ॥

तम् । सम् । आप्नोति । जूतिऽभि: । तत: । न । अप । चिकित्सति । तेन । अमृतस्य । भक्षम् । देवानाम् । न । अव । रुन्धते ॥2.१५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (तम्) = उस सूर्यसम ज्योति ब्रह्म को (जूतिभिः समाप्नोति) = कर्तव्यकर्मों को वेग से, अप्रमाद से करने के द्वारा प्रास करता है। (तत:) = उस ब्रह्म से (न अप चिकित्सति) = ये दूर रहने की कामना नहीं करता, ब्रह्म-प्राप्ति की प्रबल कामनाबाला होता है। २. (तेन) = उस ब्रह्म-प्राप्ति के उद्देश्य से ही (देवानाम्) = देवों के (अमृतस्य भक्षम्) = अमृत के भोजन को ये ब्रह्म-प्राप्ति के इच्छुक पुरुष (न अवरुन्धते) = नहीं रोकते, अर्थात् देवों की भाँति ये अमृत का भोजन करेनवाले होते हैं। यज्ञशेष ही अमृत है, अमृत का सेवन करते हुए ये ब्रह्म को प्रास करते हैं।
Essence
ब्रह्म-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि [क] हम कर्तव्यकर्मों को अप्रमाद से करनेवाले हों, [ख] ब्रह्म-प्राप्ति की प्रबल इच्छावाले हों, [ग] यज्ञशेष का सेवन करनेवाले बनें।
Subject
ब्रह्मप्राप्ति के लिए तीन बातें