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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 13/2/12

4 Sukta
46 Mantra
13/2/12
Devata- रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म सूक्त
Mantra with Swara
दि॒वि त्वात्त्रि॑रधारय॒त्सूर्या॒ मासा॑य॒ कर्त॑वे। स ए॑षि॒ सुधृ॑त॒स्तप॒न्विश्वा॑ भू॒ताव॒चाक॑शत् ॥

दि॒वि । त्वा॒ । अत्त्रि॑: । अ॒धा॒र॒य॒त् । सूर्य॑ । मासा॑य । कर्त॑वे । स: । ए॒षि॒ । सुऽधृ॑त: । तप॑न् । विश्वा॑ । भू॒ता । अ॒व॒ऽचाक॑शत् ॥2.१२॥

Mantra without Swara
दिवि त्वात्त्रिरधारयत्सूर्या मासाय कर्तवे। स एषि सुधृतस्तपन्विश्वा भूतावचाकशत् ॥

दिवि । त्वा । अत्त्रि: । अधारयत् । सूर्य । मासाय । कर्तवे । स: । एषि । सुऽधृत: । तपन् । विश्वा । भूता । अवऽचाकशत् ॥2.१२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (सूर्य) = रविमण्डल! (अत्रि:) = उस त्रिगुणातीत प्रभु ने [अ-त्रि] (त्वा) = तुझे (मासाय कर्तवे) = मास आदि कालविभागों को करने के लिए (दिवि अधारयत्) = द्युलोक में धारण किया है। २. (सः) = वह तू (सुभृतः) = सम्यक् धारण किया हुआ (तपन्) = अत्यन्त दीप्त होता हुआ (विश्वा भूता अवचाकशत्) = सब प्राणियों को देखता हुआ एषि-गति करता है।
Essence
सूर्य की गति से ही मास आदि काल-विभाग चलता है। यह सूर्य सब लोकों को प्रकाशित करता हुआ व सब प्राणियों को देखता हुआ चलता है।
Subject
'काल-निर्माता' सूर्य