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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 13/1/8

4 Sukta
60 Mantra
13/1/8
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
वि रोहि॑तो अमृशद्वि॒श्वरू॑पं समाकुर्वा॒णः प्र॒रुहो॒ रुह॑श्च। दिवं॑ रू॒ढ्वा म॑ह॒ता म॑हि॒म्ना सं ते॑ रा॒ष्ट्रम॑नक्तु॒ पय॑सा घृ॒तेन॑ ॥

वि । रोहि॑त: । अ॒मृ॒श॒त् । वि॒श्वऽरू॑पम् । स॒म्ऽआ॒कु॒र्वा॒ण: । प्र॒ऽरुह॑: । रुह॑: । च॒ । दिव॑म् । रू॒ढ्वा । म॒ह॒ता । म॒हि॒म्ना । सम् । ते॒ । रा॒ष्ट्रम् । अ॒न॒क्तु॒ । पय॑सा । घृ॒तेन॑ ॥१.८॥

Mantra without Swara
वि रोहितो अमृशद्विश्वरूपं समाकुर्वाणः प्ररुहो रुहश्च। दिवं रूढ्वा महता महिम्ना सं ते राष्ट्रमनक्तु पयसा घृतेन ॥

वि । रोहित: । अमृशत् । विश्वऽरूपम् । सम्ऽआकुर्वाण: । प्रऽरुह: । रुह: । च । दिवम् । रूढ्वा । महता । महिम्ना । सम् । ते । राष्ट्रम् । अनक्तु । पयसा । घृतेन ॥१.८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (रोहितः) = उस तेजोमय प्रभु ने (प्ररुहः रुहः च) = इस संसार-वृक्ष की ऊपर-नीचे फैली हुई शाखाओं को [अधश्चोवं प्रसृतास्तस्य शाखा:] (समाकुर्वाण:) = सम्यक् उत्पन्न करने के हेतु से (विश्वरूपं वि अमृशत्) = इस ब्रह्माण्ड के रूप का विमर्श किया। 'ब्रह्माण्ड को कैसे बनाना है, यह विचार किया-तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति । २. (महता महिम्ना) = अपनी महान् महिमा से (दिवं रुढ़वा) = तेरे मस्तिष्करूप झुलोक में आरोहण करके [अर्थात् तेरे मस्तिष्क में प्रभु की महिमा ही व्यास हो] वे प्रभु (ते राष्ट्रम्) = तेरे शरीररूप राष्ट्र को पयसा शक्तियों के आप्यायन तथा  (घृतेन) = ज्ञानदीसि से (समनक्तु) = सम्यक् अलंकृत करें। तू सदा प्रभु की महिमा का चिन्तन कर और इसप्रकार तेरी शक्तियों व ज्ञान का वर्धन हो।
Essence
प्रभु ने विविध शाखाओं से व्यास इस संसार-वृक्ष के निर्माण का विस्तार किया, जब हम उस निर्माता की महिमा का मस्तिष्क में विचार करते हैं तब वे प्रभु हमारी शक्तियों व ज्ञान का वर्धन करके हमें अलंकृत जीवनवाला बनाते हैं।
Subject
तदैक्षत बहु स्याम्