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Atharvaveda - Mantra 60

Atharvaveda 13/1/60

4 Sukta
60 Mantra
13/1/60
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- गायत्री Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यो य॒ज्ञस्य॑ प्र॒साध॑न॒स्तन्तु॑र्दे॒वेष्वात॑तः। तमाहु॑तमशीमहि ॥

य: । य॒ज्ञस्य॑ । प्र॒ऽसाध॑न: । तन्तु॑: । दे॒वेषु॑ । आऽत॑त: । तम् । आऽहु॑तम् । अ॒शी॒म॒हि॒ ॥१.६०॥

Mantra without Swara
यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः। तमाहुतमशीमहि ॥

य: । यज्ञस्य । प्रऽसाधन: । तन्तु: । देवेषु । आऽतत: । तम् । आऽहुतम् । अशीमहि ॥१.६०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (य:) = जो प्रभु (यज्ञस्य प्रसाधनः) = सब यज्ञों को सिद्ध करनेवाले हैं, 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । सब यज्ञ प्रभुकृपा से ही पूर्ण हुआ करते हैं। जो प्रभु (देवेषु) = सूर्यादि सब देवों में (आततः तन्तुः) = फैले हुए तन्तु हैं। वस्तुत: प्रभु के कारण ही उस-उस पिण्ड में वह वह शक्ति दृष्टिगोचर होती है। ('पुण्यो गन्धः पृथिवीं च रसोऽहमप्सु कौन्तेय। तेन शक्तिरस्मि विभावसौ प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ॥ तेजस्तेजस्वितामहं बलं बलवतः चाहम्। बुद्धि बुद्धिमतामस्मि।') २. (तम्) = उस (आहुतम्) = समन्तात् दानोंवाले प्रभु को (अशीमहि) = हम सेवन करनेवाले बने, प्रभु का ही मनन करें।
Essence
प्रभु सब यज्ञों के साधक हैं, सब देवों में व्यास सूत्र हैं। इन प्रभु के ही दान समन्तात् दृष्टिगोचर होते हैं। इनका हम उपासन करें। अथ द्वितीयोऽनुवाकः

 
Subject
यज्ञस्य प्रसाधनः