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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 13/1/6

4 Sukta
60 Mantra
13/1/6
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
रोहि॑तो॒ द्यावा॑पृथि॒वी ज॑जान॒ तत्र॒ तन्तुं॑ परमे॒ष्ठी त॑तान। तत्र॑ शिश्रिये॒ऽज एक॑पा॒दोऽदृं॑ह॒द्द्यावा॑पृथि॒वी बले॑न ॥

रोहि॑त: । द्यावा॑पृथि॒वी । इति॑ । ज॒जा॒न॒ । तत्र॑ । तन्तु॑म् । प॒र॒मे॒ऽस्थी । त॒ता॒न॒ । तत्र॑ । शि॒श्रि॒ये॒ । अ॒ज: । एक॑ऽपाद: । अदृं॑हत् । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । बले॑न ॥१,६॥

Mantra without Swara
रोहितो द्यावापृथिवी जजान तत्र तन्तुं परमेष्ठी ततान। तत्र शिश्रियेऽज एकपादोऽदृंहद्द्यावापृथिवी बलेन ॥

रोहित: । द्यावापृथिवी । इति । जजान । तत्र । तन्तुम् । परमेऽस्थी । ततान । तत्र । शिश्रिये । अज: । एकऽपाद: । अदृंहत् । द्यावापृथिवी इति । बलेन ॥१,६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (रोहित:) = वह सदा से प्रवृद्ध तेजोमय प्रभु (द्यावापृथिवी जजान) = द्युलोक व पृथिवीलोक को-तदन्तरवर्ती सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जन्म देते हैं। (तत्र) = उस ब्रह्माण्ड में (परमेष्ठी) = परम स्थान में स्थित प्रभु (तन्तुं ततान) = [तन्तु offspring, issue, race, cobweb] प्राणिजातियों को-शरीरों के जाल को विस्तृत करते हैं। प्रभु सृष्टि को उत्पन्न करते हैं, उसमें विविध प्राणियों के जाल का विस्तार करते हैं। २. (तत्र) = उस विस्तृत तन्तु में-प्राणिमात्र के हृदय में (एकपादः अज:) = एक चाल से चलनेवाले, सम्पूर्ण संसार को गति देनेवाले एकरस प्रभु (शिश्रिये) = आश्रय करते हैं। सबके हृदयों में प्रभु का निवास है। वे प्रभु ही (बलेन) = अपनी शक्ति से (द्यावापृथिवी अदृहत्) = सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को-द्युलोक व पृथिवीलोक को दृढ़ किये हुए हैं। प्रभु ही सारे ब्रह्माण्ड का धारण कर रहे हैं।
Essence
प्रभु सारे ब्रह्माण्ड को जन्म देते हैं। विविध प्रजातन्तु का उसमें विस्तार करते हैं। सबको गति देनेवाले वे एकरस प्रभु सबके हृदयों में आसीन हैं। सारे ब्रह्माण्ड को अपनी शक्ति से धारण किये हुए हैं।
Subject
'उत्पादक व धारक' प्रभु