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Atharvaveda - Mantra 59

Atharvaveda 13/1/59

4 Sukta
60 Mantra
13/1/59
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- गायत्री Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
मा प्र गा॑म प॒थो व॒यं मा य॒ज्ञादि॑न्द्र सो॒मिनः॑। मान्त स्थु॑र्नो॒ अरा॑तयः ॥

मा । प्र । गा॒म॒ । प॒थ: । व॒यम् । मा । य॒ज्ञात् । इ॒न्द्र॒ । सो॒मिन॑: । मा । अ॒न्त: । स्थु॒: । न॒: । अरा॑तय: ॥१.५९॥

Mantra without Swara
मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः। मान्त स्थुर्नो अरातयः ॥

मा । प्र । गाम । पथ: । वयम् । मा । यज्ञात् । इन्द्र । सोमिन: । मा । अन्त: । स्थु: । न: । अरातय: ॥१.५९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! (वयम्) = हम (पथः मा प्रगाम) = मार्ग से विचलित न हों। मार्गभ्रष्ट होकर हम आपसे दूर न हो जाएँ। हे प्रभो! हम (सोमिन:) = अपने में सोम [वीर्यशक्ति] का रक्षण करनेवाले (यज्ञात) = यज्ञ से-देवपूजा, संगतिकरण व दानरूप उत्तम कर्म से दूर न हों। बड़ों के आदर, परस्पर प्रेम व दान की वृत्तिवाले बनकर हम शरीर में सोम का रक्षण कर पाएँ। ३. हे प्रभो! आप ऐसा अनुग्रह कीजिए कि (अरातयः) = काम-क्रोध-लोभादि शत्रु (नः अन्त: मा स्थुः) = हमारे अन्दर स्थित न हों। हमारा हृदय इन कामादि का अधिष्ठान न हो। इन शत्रुओं से अपने हृदय को शून्य करके ही हम आपके दर्शन के योग्य बन पाएंगे।

 
Essence
हम मार्गभ्रष्ट न हों, यज्ञशील, 'काम-क्रोध-लोभ' से शुन्य हों।

 
Subject
मार्ग पर मा प्र गाम