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Atharvaveda - Mantra 58

Atharvaveda 13/1/58

4 Sukta
60 Mantra
13/1/58
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यो अ॒द्य दे॑व सूर्य॒ त्वां च॒ मां चा॑न्त॒राय॑ति। दुः॒ष्वप्न्यं॒ तस्मि॒ञ्छम॑लं दुरि॒तानि॑ च मृज्महे ॥

य: । अ॒द्य । दे॒व॒ । सू॒र्य॒ त्वाम् । च॒ । माम् । च॒ । अ॒न्त॒रा । अय॒ति । दु॒:ऽस्वप्न्य॑म् । तस्मि॑न् । शम॑लम् । दु॒:ऽइ॒तानि॑। च॒ । मृ॒ज्म॒हे॒ ॥१.५८॥

Mantra without Swara
यो अद्य देव सूर्य त्वां च मां चान्तरायति। दुःष्वप्न्यं तस्मिञ्छमलं दुरितानि च मृज्महे ॥

य: । अद्य । देव । सूर्य त्वाम् । च । माम् । च । अन्तरा । अयति । दु:ऽस्वप्न्यम् । तस्मिन् । शमलम् । दु:ऽइतानि। च । मृज्महे ॥१.५८॥

Meaning
१. हे (देव सूर्य) = प्रकाशमय गतिशील प्रभो! (अद्य) = आज (य:) = जो भी बात (त्वां च मां च अन्तरा) = आपके और मेरे बीच में (अयति) = आती है, अर्थात् मुझे आपके दर्शन से रोकती है, (तस्मिन्) = उसके निमित्त-उसे दूर करने के लिए (दु:ष्वप्न्य) = अशुभ स्वप्नों के कारणभूत प्रत्येक वस्तु को, (शमलम्) = [sin, moral impurity] नैतिक दोषों को, दुरितानि च और अशुभ कर्मों को मृज्महे दूर करते हैं। २. ये 'दुःष्वप्न्य, शमल व दुरित' ही हमें प्रभु-दर्शन से वंचित करने का कारण बनते हैं। इन्हें दूर करके हम अपने जीवन का शोधन करते हुए अपने को प्रभु दर्शन के योग्य बनाते हैं।

 
Essence
उस 'प्रकाशमय, गति के स्रोत' प्रभु का दर्शन उसे ही होता है जो 'दुःष्वप्नों, शमलों व दुरितों' को दूर कर पाता है।
Subject
'दु:ष्वप्न्य शमल व दुरित' दूरीकरण

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