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Atharvaveda - Mantra 57

Atharvaveda 13/1/57

4 Sukta
60 Mantra
13/1/57
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- ककुम्मत्यनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यो मा॑भिच्छा॒यम॒त्येषि॒ मां चा॒ग्निं चा॑न्त॒रा। तस्य॑ वृश्चामि ते॒ मूलं॒ न च्छा॒यां क॑र॒वोऽप॑रम् ॥

य: । मा॒ । अ॒भि॒ऽछा॒यम् । अ॒त‍ि॒ऽएषि॑: । माम् । च॒ । अ॒ग्निम् । च॒ । अ॒न्त॒रा । तस्य॑ । वृ॒श्चा॒मि । ते॒ । मूल॑म् । न । छा॒याम् । क॒र॒व॒: । अप॑रम् ॥१.५७॥

Mantra without Swara
यो माभिच्छायमत्येषि मां चाग्निं चान्तरा। तस्य वृश्चामि ते मूलं न च्छायां करवोऽपरम् ॥

य: । मा । अभिऽछायम् । अत‍िऽएषि: । माम् । च । अग्निम् । च । अन्तरा । तस्य । वृश्चामि । ते । मूलम् । न । छायाम् । करव: । अपरम् ॥१.५७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यः) = जो तू (अभिच्छायाम्) = सौन्दर्य की ओर चल रहे, अर्थात् सुन्दर पथ का आक्रमण कर रहे (मा) = मुझे (अत्येषि) = [अति इ-subdue] दबाता है, सताता है, (तस्य ते) = उस तेरे (मूलं वृश्चामि) = मूल को मैं काट देता हूँ। वस्तुत: उत्तम पथ पर चल रहे व्यक्तियों को पीड़ित करनेवाले को समाप्त कर देना आवश्यक ही है। २. (मां च अग्रिं च अन्तरा) = मेरे और अग्नि के बीच में जो तू [अत्येषि] अतिशयेन आता है वह तू (अपरम्) = इसके बाद छायां न करव:-सौन्दर्य को करनेवाला न हो। एक व्यक्ति और अग्नि के बीच में आने का भाव है 'यज्ञों में विघ्न करना। जो भी यज्ञ करते हुए पुरुष के लिए विघ्न करनेवाला बनता है उसका सौन्दर्य समाप्त हो जाता है। वह यज्ञविहन्ता देव न रहकर असुर बन जाता है।
Essence
सुन्दर पथ पर चलते हुए व्यक्ति को विहत करनेवाला नष्ट हो जाता है। यजनशील के यज्ञ का विघातक पुरुष अपने जीवन के सौन्दर्य को समाप्त कर लेता है
Subject
यज्ञों में विघ्न करने का परिणाम