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Atharvaveda - Mantra 56

Atharvaveda 13/1/56

4 Sukta
60 Mantra
13/1/56
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यश्च॒ गां प॒दा स्फु॒रति॑ प्र॒त्यङ्सूर्यं॑ च॒ मेह॑ति। तस्य॑ वृश्चामि ते॒ मूलं॒ न च्छा॒यां क॑र॒वोऽप॑रम् ॥

य: । च॒ । गाम् । प॒दा । स्फु॒रति॑ । प्र॒त्यङ् । सूर्य॑म् । च॒ । मेह॑ति। तस्य॑ । वृ॒श्चा॒मि॒ । ते॒ । मूल॑म् । न । छा॒याम् । क॒र॒व॒: । अप॑रम् ॥१.५६॥

Mantra without Swara
यश्च गां पदा स्फुरति प्रत्यङ्सूर्यं च मेहति। तस्य वृश्चामि ते मूलं न च्छायां करवोऽपरम् ॥

य: । च । गाम् । पदा । स्फुरति । प्रत्यङ् । सूर्यम् । च । मेहति। तस्य । वृश्चामि । ते । मूलम् । न । छायाम् । करव: । अपरम् ॥१.५६॥

Meaning
१. इस सृष्टि में मनुष्य को 'गौ व सूर्य' का आदर करना है। 'गौ' मनुष्य को सात्विक दूध प्राप्त कराके 'स्वस्थ शरीर, पवित्र मन व दीस मस्तिष्क' प्राप्त कराती है। इसीप्रकार सूर्य की किरणें सब रोगकृमियों का नाश करती हुई उसे स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। आयुर्वेद में सूर्याभिमुख होकर मेहन से मूत्रकृच्छ' आदि रोग हो जाने का उल्लेख है। २. मन्त्र में कहते हैं कि (यः च गां पदा स्फुरति) = जो निश्चय से गौ को पाँव से कुचलने की करता है [to braise, destroy],(च) = और (सूर्य प्रत्यङ्) = सूर्याभिमुख होकर (मेहति) = मूत्र करता है, (तस्य ते) = उस तेरे (मूलं वृश्चामि) = मूल को काट डालता हूँ। तू (अपरम्) = इसके बाद (छायां न करव:) = [छाया beauty] जीवन के सौन्दर्य को करनेवाला न हो, तेरे जीवन का सौन्दर्य समाप्त हो जाए।
Essence
हम जीवन में गौ का समुचित आदर करें, घर में गौ का प्रथम स्थान हो। गौ को घर का मूल समझें। हम सूर्य की किरणों को सदा शरीर पर लेनेवाले बनें। 'सूर्याभिमुख होकर मूत्र करने से रोग हो जाते हैं, इसे कभी न भूलें। 'सूर्याभिमुख मेहन' जीवन के सौन्दर्य को समाप्त करनेवाला है।
Subject
गौ व सूर्य का आदर

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