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Atharvaveda - Mantra 53

Atharvaveda 13/1/53

4 Sukta
60 Mantra
13/1/53
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
व॒र्षमाज्यं॑ घ्रं॒सो अ॒ग्निर्वेदि॒र्भूमि॑रकल्पत। तत्रै॒तान्पर्व॑तान॒ग्निर्गी॒र्भिरू॒र्ध्वाँ अ॑कल्पयत् ॥

व॒र्षम् । आज्य॑म् । घ्रं॒स: । अ॒ग्नि: । वेदि॑: । भूमि॑: । अ॒क॒ल्प॒त॒ । तत्र॑ । ए॒तान् । पर्व॑तान् । अ॒ग्नि: । गी॒:ऽभि: ऊ॒र्ध्वान् । अ॒क॒ल्प॒य॒त् ॥१.५३॥

Mantra without Swara
वर्षमाज्यं घ्रंसो अग्निर्वेदिर्भूमिरकल्पत। तत्रैतान्पर्वतानग्निर्गीर्भिरूर्ध्वाँ अकल्पयत् ॥

वर्षम् । आज्यम् । घ्रंस: । अग्नि: । वेदि: । भूमि: । अकल्पत । तत्र । एतान् । पर्वतान् । अग्नि: । गी:ऽभि: ऊर्ध्वान् । अकल्पयत् ॥१.५३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अग्निः) = उस अग्रणी प्रभु ने वर्ष (आग्यं अकल्पयत्) = वृष्टि को ही इस सृष्टियज्ञ के लिए घृत के रूप में बनाया। इस यज्ञ में (घ्रंस:) = देदीप्यमान सूर्य ही (अग्नि:) = अग्नि हुआ। (भूमि: वेदिः) = यह पृथिवी ही सृष्टि-यज्ञ की वेदि हुई। २. (तत्र) = उस वेदि पर प्रभु ने (गीर्भिः) = वेदवाणियों के द्वारा (एतान् पर्वतान्) = इन पर्वतों को (ऊवान् अकल्पयत्) = ऊपर यज्ञस्तम्भों के रूप में खड़ा किया। ऐसा प्रतीत होता है कि पर्वतरूप यज्ञस्तम्भों पर वेदवाणियाँ अंकित हों। ये हिमाच्छादित पर्वत प्रभु की महिमा का प्रतिपादन तो कर ही रहे हैं।
Essence
इस सृष्टि-यज्ञ में 'वृष्टि' घृत है। 'सूर्य' अग्नि और 'भूमि' वेदि है। यहाँ पर्वत यज्ञस्तम्भ हैं, जिनपर वेदवाणियाँ मानो अंकित हुई हैं।
Subject
सृष्टियज्ञ की सामग्री