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Atharvaveda - Mantra 51

Atharvaveda 13/1/51

4 Sukta
60 Mantra
13/1/51
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यं वातः॑ परि॒शुम्भ॑ति॒ यं वेन्द्रो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑। ब्रह्मे॑द्धाव॒ग्नी ई॑जाते॒ रोहि॑तस्य स्व॒र्विदः॑ ॥

यम् । वात॑: । प॒रि॒ऽशुम्भ॑ति । यम् । वा॒ । इन्द्र॑: । ब्रह्म॑ण: । पति॑: । ब्रह्म॑ऽइध्दौ ।अ॒ग्नी इति॑ । ई॒जा॒ते॒‍ इति॑ । रोहि॑तस्य । स्व॒:ऽविद॑: ॥१.५१॥

Mantra without Swara
यं वातः परिशुम्भति यं वेन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः। ब्रह्मेद्धावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः ॥

यम् । वात: । परिऽशुम्भति । यम् । वा । इन्द्र: । ब्रह्मण: । पति: । ब्रह्मऽइध्दौ ।अग्नी इति । ईजाते‍ इति । रोहितस्य । स्व:ऽविद: ॥१.५१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यम्) = जिस चन्द्र-[आह्लाद]-रूप अग्नि को (वात:) = वायु की भाँति निरन्तर गतिशील पुरुष (परिशुम्भति) = अपने जीवन में अलंकृत करता है। (यं वा) = तथा जिस ज्ञान-सूर्यरूप अग्नि को (इन्द्रः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष (ब्रह्मणस्पतिः) = वेदज्ञान का पति होता हुआ अपने में सुशोभित करता है। ये दोनों कर्म व ज्ञानरूप (अग्री) = अग्नियाँ (ब्रह्मेद्धौ) = उस प्रभु द्वारा समिद्ध की जाकर (रोहितस्य स्वर्विदः) = सदावद्ध व सुख प्राप्त करानेवाले प्रभु के यज्ञ को (ईजाते) = सम्पन्न करती हैं। सारे ब्रह्माण्ड में यह सृष्टि-यज्ञ सूर्य व चन्द्र द्वारा चल रहा है। यही जीवन-यज्ञ इस पिण्ड में ज्ञान व कर्मरूप अग्नियों द्वारा चलता है।
Essence
भावार्थ-हम वायु के समान निरन्तर क्रियाशील बनकर हृदय में आनन्द के चन्द्र को उदित करें। जितेन्द्रिय व ज्ञानी बनकर मस्तिष्करूप झुलोक में ज्ञानसूर्य को उदित करें। इसप्रकार प्रभु से प्रदत्त इन ज्ञान व कर्मरूप अग्रियों से हमारा जीवन-यज्ञ सम्प्रवृत्त हो।
Subject
वात: इन्द्रः ब्रह्मणस्पतिः