Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 44

Atharvaveda 13/1/44

4 Sukta
60 Mantra
13/1/44
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- परोष्णिक् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
वेद॒ तत्ते॑ अमर्त्य॒ यत्त॑ आ॒क्रम॑णं दि॒वि। यत्ते॑ स॒धस्थं॑ पर॒मे व्योमन् ॥

वेद॑ । तत् । ते॒ । अ॒म॒र्त्य॒ । यत् । ते॒ । आ॒ऽक्रम॑णम् । दि॒वि । यत् । ते॒ । स॒धऽस्थ॑म् । प॒र॒मे । व‍िऽओ॑मन् ॥१.४४॥

Mantra without Swara
वेद तत्ते अमर्त्य यत्त आक्रमणं दिवि। यत्ते सधस्थं परमे व्योमन् ॥

वेद । तत् । ते । अमर्त्य । यत् । ते । आऽक्रमणम् । दिवि । यत् । ते । सधऽस्थम् । परमे । व‍िऽओमन् ॥१.४४॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. हे (अमर्त्य) -= अमरणधर्मा, अविनाशी प्रभो ! (यत् ते) = जो आपका (दिवि आक्रमणम्) = प्रकाशमय लोकों में आक्रमण है, (ते तत् वेद) = आपके उस रूप को मैं जानता हैं, 'आप प्रकाशस्वरूप हैं', ऐसा मैं समझता हूँ। २. (यत्) = जो (ते) = आपका (परमे व्योमन्) = इस सर्वोत्कृष्ट हृदयाकाश में (सधस्थम्) = मिलकर ठहरना-आत्मा के साथ स्थित होना है, उसे मैं जानता हूँ। जीव को दो बातें समझनी हैं-१. यह कि प्रभु प्रकाशरूप हैं, प्रभु की प्राप्ति के लिए ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। २. प्रभु का दर्शन हृदयदेश में होगा, जब भी चित्तवृत्ति का निरोध करके हम अन्तर्मुखी वृत्तिवाले बनेंगे तभी हृदय में प्रभु के साथ अपने को स्थित पाएँगे।
Essence
प्रभु-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि स्वाध्याय द्वारा हम ज्ञान को बढ़ाएँ तथा चित्तवृत्ति के निरोध का अभ्यास करते हुए अन्तर्मुख वृत्तिवाले बनें।
Subject
स्वाध्याय व ध्यान