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Atharvaveda - Mantra 42

Atharvaveda 13/1/42

4 Sukta
60 Mantra
13/1/42
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- विराड्जगती Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
एक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पद्य॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑। स॒हस्रा॑क्षरा॒ भुव॑नस्य प॒ङ्क्तिस्तस्याः॑ समु॒द्रा अधि॒ वि क्ष॑रन्ति ॥

एक॑ऽपदी । द्वि॒ऽपदी॑ । सा । चतु॑:ऽपदी । अ॒ष्टाऽप॑दी । नव॑ऽपदी । ब॒भू॒वुषी॑ । स॒हस्र॑ऽअक्षरा । भुव॑नस्य । प॒ङ्क्ति । तस्या॑: । स॒मु॒द्रा: । अधि॑ । वि । क्ष॒र॒न्ति॒ ॥१.४२॥

Mantra without Swara
एकपदी द्विपदी सा चतुष्पद्यष्टापदी नवपदी बभूवुषी। सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति ॥

एकऽपदी । द्विऽपदी । सा । चतु:ऽपदी । अष्टाऽपदी । नवऽपदी । बभूवुषी । सहस्रऽअक्षरा । भुवनस्य । पङ्क्ति । तस्या: । समुद्रा: । अधि । वि । क्षरन्ति ॥१.४२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यह वेदवाणी (एकपदी) = [पद गतौ, गति: ज्ञानम्] उस अद्वितीय प्रभु का ज्ञान देती है। (द्विपदी) = जीव-परमात्मा का 'द्वा सुपर्णा' आदि मन्त्रों में चित्रण करती है। (सा चतुष्पदी) = यह वाणी 'सोऽयमात्मा चतुष्पाद', इन उपनिषद् शब्दों के अनुसार आत्मा के चार पदों का वर्णन करती है। (अष्टापदी) = 'भूमि, आपः, अनल, वायु, खं, मनः, बुद्धि व अहंकार' रूप प्रभु की आठ मूर्तियों का प्रतिपादन करती है तथा (नवपदी बभूवुषी) = शरीरस्थ आत्मा के इन्द्रियरूप नवद्वारों [अष्टाचक्रा नवद्धारा०] का वर्णन करनेवाली होती हुई यह वाणी (सहस्त्राक्षरा) = हजारों प्रकार से प्रभु के रूप का व्यापन कर रही है [अश् व्याप्ती]। २. प्रभु का प्रतिपादन करती हुई यह वाणी (भुवनस्य पङ्गिः) = इस ब्रह्माण्ड का विस्तार करनेवाली है [पच् विस्तारे]। सम्पूर्ण भुवन का विस्तृत प्रतिपादन करती है। (तस्याः) = उस वेदवाणी से ही (समुद्रा:) = सब विज्ञानों के समुद्र (अधिविक्षरन्ति) = प्रवाहित होते हैं। सब सत्यविद्याओं का आदिलोत यही तो है।
Essence
यह वेदवाणी आत्मा व परमात्मा का विविध रूपों में वर्णन करती हुई भुवन की विद्याओं का भी विस्तृत वर्णन करती है। यह सब सत्यविद्याओं का आदिस्रोत है।
Subject
एकपदी-नवपदी