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Atharvaveda - Mantra 41

Atharvaveda 13/1/41

4 Sukta
60 Mantra
13/1/41
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
अ॒वः परे॑ण प॒र ए॒नाव॑रेण प॒दा व॒त्सं बिभ्र॑ती॒ गौरुद॑स्थात्। सा क॒द्रीची॒ कं स्वि॒दर्धं॒ परा॑गा॒त्क्व स्वित्सूते न॒हि यू॒थे अ॒स्मिन् ॥

अ॒व: । परे॑ण । प॒र: । ए॒ना। अव॑रेण । प॒दा । व॒त्सम् । बिभ्र॑ती । गौ: । उत् । अ॒स्था॒त् । सा । क॒द्रीची॑ । कम् । स्वि॒त् । अर्ध॑म् । परा॑ । अ॒गा॒त् । क्व᳡। स्वि॒त् । सू॒ते॒ । न॒हि । यू॒थे । अ॒स्मिन् ॥१.४१॥

Mantra without Swara
अवः परेण पर एनावरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्। सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात्क्व स्वित्सूते नहि यूथे अस्मिन् ॥

अव: । परेण । पर: । एना। अवरेण । पदा । वत्सम् । बिभ्रती । गौ: । उत् । अस्थात् । सा । कद्रीची । कम् । स्वित् । अर्धम् । परा । अगात् । क्व। स्वित् । सूते । नहि । यूथे । अस्मिन् ॥१.४१॥

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Meaning
१. अपराविद्या 'अव:' है, तो पराविद्या 'पर:' है। (अवः परेण) = अपराविद्या को पराविद्या के साथ तथा (पर:) = पराविद्या को (एना अवरेण) = इस अपराविद्या के साथ (पदा) = अपने पदों से शब्दों से (बिभ्रती) = धारण करती हुई (गौ:) = यह वेदवाणी (वत्सम्) = [वदति] उच्चारण करनेवाले इस जीवरूप वत्स को (उत् अस्थात्) = उन्नत करती है [उत्थापयति]। अकेली प्रकृतिविद्या अन्धकार में ले-जाती है, तो अकेली आत्मविद्या घोर अन्धकार में प्रास कराती है। यह वेदवाणी दोनों का मेल करती हुई प्रकृतिविद्या से हमें मृत्यु से तैराती है तथा आत्मविद्या से अमृतत्व को प्राप्त कराती है। प्रकृतिविद्या से अभ्युदय को सिद्ध करती है तो आत्मविद्या से निःश्रेयस को। २. इसप्रकार (सा) = वह वेदवाणी (कद्रीची) = [कौ अञ्चति] पृथिवी पर गति करती हुई (कंस्वित्) = कितने (महान् अर्धम्) = सर्वोच्च स्थान को (परागात्) = सुदुर प्राप्त करती है। अपने बाह्य अर्थों से यह प्रकृति का ज्ञान देती हुई अन्तर अर्थों से प्रभु का साक्षात्कार कराती है। इसप्रकार प्रभु-दर्शन कराती हुई यह वेदवाणी (क्वस्वित् सूते) = भला जन्म कहाँ देती है? यह मुक्ति की स्थिति को प्राप्त कराके जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठा देती है। मुक्ति न भी प्राप्त हो तो भी नहि यूथे अस्मिन्-सामान्य लोकसमूह में तो जन्म देती ही नहीं, 'शचीनां श्रीमतां गेहे', अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम' पवित्र श्रीमानों व योगियों के कुल में यह हमें जन्म प्राप्त कराती है. तत्र तं यद्धिसंयोग लभते पौर्वदेहिकम्' वहाँ उत्तम बुद्धिसंयोग को प्राप्त करके हम मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते है।
Essence
वेदवाणी अपरा व पराविद्या का समन्वय करके हमें मृत्यु से ऊपर उठाकर अमृतत्व प्राप्त कराती है। यह प्रकृतिविद्या द्वारा अभ्युदय में गति कराती हुई आत्मविद्या से मोक्ष में पहुँचाती है। यह हमें जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठाती है अथवा योगियों के प्रशस्त कुल में ही जन्म देती है।
Subject
प्रकृतिविद्या आत्मविद्या