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Atharvaveda - Mantra 40

Atharvaveda 13/1/40

4 Sukta
60 Mantra
13/1/40
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
दे॒वो दे॒वान्म॑र्चयस्य॒न्तश्च॑रस्यर्ण॒वे। स॑मा॒नम॒ग्निमि॑न्धते॒ तं वि॑दुः क॒वयः॒ परे॑ ॥

दे॒व: । दे॒वान् । म॒र्च॒य॒सि॒ । अ॒न्त: । च॒र॒सि॒ । अ॒र्ण॒वे । स॒मा॒नम् । अ॒ग्निम् । इ॒न्ध॒ते॒ । तम् । वि॒दु॒: । क॒वय॑: । परे॑ ॥१.४०॥

Mantra without Swara
देवो देवान्मर्चयस्यन्तश्चरस्यर्णवे। समानमग्निमिन्धते तं विदुः कवयः परे ॥

देव: । देवान् । मर्चयसि । अन्त: । चरसि । अर्णवे । समानम् । अग्निम् । इन्धते । तम् । विदु: । कवय: । परे ॥१.४०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे प्रभो! (देव:) = आप प्रकाशमय व सम्पूर्ण गति के स्रोत हैं (देवान् मर्चयसि) = सूर्यादि सब देवों को आप ही [मर्च to move] गति देते हैं। आप ही (अर्णवे) = गतिमय अणुसमुद्र के (अन्तः चरसि) = अन्दर विचरण करते हैं-एक-एक कण में आप व्याप्त हैं। २. (तम्) = उस (समानम्) = [सम्यक् आनयति] सबको समानरूप से प्राणित करनेवाले (अग्रिम्) = अग्रणी प्रभु को (कवयः) = क्रान्तदर्शी विद्वान् (इन्धते) = अपने हदयों में समिद्ध करते हैं। उस प्रभु को (परे) = प्राकृतिक भोगों से दूर रहनेवाले ज्ञानी ही (विदुः) = जानते हैं।
Essence
प्रभु ही सूर्यादि सब पिण्डों को गति देते हैं। अणुसमुद्र में भी प्रभु व्याप्त हैं। उस प्रभु को ज्ञानी अपने हृदयों में समिद्ध करते हैं। प्रभु का ज्ञान उन्हीं को होता है जो प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठते हैं।
Subject
प्रभु का दर्शन