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Atharvaveda - Mantra 39

Atharvaveda 13/1/39

4 Sukta
60 Mantra
13/1/39
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
अ॒मुत्र॒ सन्नि॒ह वे॑त्थे॒तः संस्तानि॑ पश्यसि। इ॒तः प॑श्यन्ति रोच॒नं दि॒वि सूर्यं॑ विप॒श्चित॑म् ॥

अ॒मुत्र॑ । सन् । इ॒ह । वे॒त्थ॒ । इ॒त: । सन् । तानि॑ । प॒श्य॒सि॒ । इ॒त: । प॒श्य॒न्ति॒ । रो॒च॒नम् । दि॒वि । सूर्य॑म् । वि॒प॒:ऽचित॑म् ॥१.३९॥

Mantra without Swara
अमुत्र सन्निह वेत्थेतः संस्तानि पश्यसि। इतः पश्यन्ति रोचनं दिवि सूर्यं विपश्चितम् ॥

अमुत्र । सन् । इह । वेत्थ । इत: । सन् । तानि । पश्यसि । इत: । पश्यन्ति । रोचनम् । दिवि । सूर्यम् । विप:ऽचितम् ॥१.३९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे प्रभो! आप (अमुत्र सन्) = उस सुदूर स्थान में होते हुए (इह वेत्थ) = यहाँ सब-कुछ जानते हो और (इत:सन्) = इधर होते हुए (तानि पश्यसि) = उन सुदूर की वस्तुओं को भी देखते हो। २. इसप्रकार प्रभु के उपासक (इत:) = इधर हृदयदेश में उस प्रभु को (पश्यन्ति) = देखते हैं, जो प्रभु (रोचनम्) = दीप्त  हैं, (दिवि सूर्यम्) = अपने प्रकाशमय स्वरूप में निरन्तर गतिवाले हैं। (विपश्चितम्) = ज्ञानी हैं। २. प्रभु का हृदय में ध्यान करते हुए हम भी ओजस्वी बनें [रोचनम्], ज्ञानपूर्वक क्रियाओं को करनेवाले हों [दिवि सूर्यम्] अधिक-से-अधिक ज्ञान को प्राप्त करें [विपश्चितम्]।
Essence
प्रभु पृथिवीलोक में स्थित होते हुए द्युलोक को सम्यक् देखते हैं, धुलोक में होते हुए पृथिवी को सम्यक् देखते हैं। इन प्रभु को उपासक हृदय में 'रोचन, सूर्य, विपश्चित्' रूप में देखता है। ऐसा ही बनने का प्रयत्न करता है।
Subject
रोचन सूर्य विपश्चित्