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Atharvaveda - Mantra 37

Atharvaveda 13/1/37

4 Sukta
60 Mantra
13/1/37
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- परशाक्वरा विराडतिजगती Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
रोहि॑ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी अधि॑ श्रि॒ते व॑सु॒जिति॑ गो॒जिति॑ संधना॒जिति॑। स॒हस्रं॒ यस्य॒ जनि॑मानि स॒प्त च॑ वो॒चेयं॑ ते॒ नाभिं॒ भुव॑न॒स्याधि॑ म॒ज्मनि॑ ॥

रोहि॑ते । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । अधि॑ । श्रि॒ते इति॑ । व॒सु॒ऽज‍िति॑ । गो॒ऽजिति॑ । सं॒ध॒न॒ऽजिति॑ । स॒हस्र॑म् । यस्य॑ । जनि॑मानि । स॒प्त । च॒ । वोचेय॑म् । ते॒ । नाभि॑म् । भुव॑नस्य । अधि॑ । म॒ज्मनि॑ ॥१.३७॥

Mantra without Swara
रोहिते द्यावापृथिवी अधि श्रिते वसुजिति गोजिति संधनाजिति। सहस्रं यस्य जनिमानि सप्त च वोचेयं ते नाभिं भुवनस्याधि मज्मनि ॥

रोहिते । द्यावापृथिवी इति । अधि । श्रिते इति । वसुऽज‍िति । गोऽजिति । संधनऽजिति । सहस्रम् । यस्य । जनिमानि । सप्त । च । वोचेयम् । ते । नाभिम् । भुवनस्य । अधि । मज्मनि ॥१.३७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (रोहिते) = अतिशयेन तेजस्वी व सदावृद्ध प्रभु में ही (द्यावापृथिवी) = ये द्युलोक व पृथिवीलोक (अधिश्रिते) = आश्रित हैं। द्यावापृथिवी के अन्तर्गत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को वे प्रभु ही धारण कर रहे हैं, जो (वसुजिति) = वसुओं को जीतनेवाले है-हमारे लिए सब वसुओं [निवास के लिए आवश्यक पदार्थों] को प्रास करानेवाले हैं। (गोजिति) = हमारे लिए गौओं का विजय करानेवाले हैं-गौओं को प्राप्त करानेवाले हैं। अथवा [गाव: इन्द्रियाणि] हमारे लिए इन्द्रियों का विजय करनेवाले हैं-प्रभु-स्मरण ही हमें इन्द्रियों के विजय के योग्य बनाता है। (सन्धनाजिति) = वे प्रभु ही धनों का सम्यक् विजय करनेवाले हैं। प्रभु वे हैं (यस्य) = जिनके (सहस्त्रं जनिमानि) = हजारों प्रादुर्भाव हैं वे प्रभु हज़ारों लोकों का निर्माण करते हैं (च) = और उन लोकों में (सप्त) = 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' इन सात ऋषियों को जन्म देते हैं, जिनके द्वारा हमारा यह सप्तहोता यज्ञ चलता है, 'येन यज्ञस्तायते सतहोता'। हे प्रभो ! मैं (मज्मनि) = बल के निमित्त-बल प्राप्त करने के लिए (ते) = आपके द्वारा उपदिष्ट (भुवनस्य नाभिम्) = इस भुवन के केन्द्रभूत यज्ञ को 'अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः' (अधिवोचेयम्) = आधिक्येन कहूँ-जीवन से यज्ञों का ही प्रतिपादन करूँ-यज्ञनशील बनें।
Essence
प्रभु ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार हैं। प्रभु ही वसुओं, गौओं व धनों का विजय करनेवाले हैं। सब लोकों को प्रभु उत्पन्न करते हैं और जीवन-यज्ञों को सम्यक् पूर्ण करने के लिए 'दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें ब मुख' को प्राप्त कराते हैं। हम बल प्रास करने के लिए सप्तहोतृक यज्ञों का विस्तार करें।
Subject
वसुजिति गोजिति सन्धनाजिति