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Atharvaveda - Mantra 36

Atharvaveda 13/1/36

4 Sukta
60 Mantra
13/1/36
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- निचृन्महाबृहती Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
उत्त्वा॑ य॒ज्ञा ब्रह्म॑पूता वहन्त्यध्व॒गतो॒ हर॑यस्त्वा वहन्ति। ति॒रः स॑मु॒द्रमति॑ रोचसेऽर्ण॒वम् ॥

उत् । त्वा॒ । य॒ज्ञा: । ब्रह्म॑ऽपूता: । व॒ह॒न्ति॒ । अ॒ध्व॒ऽगत॑: । हर॑य: । त्वा॒ । व॒ह॒न्ति॒ । ति॒र: । स॒मु॒द्रम् । अति॑ । रो॒च॒से॒ । अ॒र्ण॒वम् ॥१.३६॥

Mantra without Swara
उत्त्वा यज्ञा ब्रह्मपूता वहन्त्यध्वगतो हरयस्त्वा वहन्ति। तिरः समुद्रमति रोचसेऽर्णवम् ॥

उत् । त्वा । यज्ञा: । ब्रह्मऽपूता: । वहन्ति । अध्वऽगत: । हरय: । त्वा । वहन्ति । तिर: । समुद्रम् । अति । रोचसे । अर्णवम् ॥१.३६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र में संकेतित देव बनने के लिए हमें क्या करना है? इसका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि (त्वा) = तुझे (ब्रह्मपूता: यज्ञाः उद्वहन्ति) = वेदमन्त्रों से पवित्र हुए-हुए यज्ञ विषयवासनाओं से ऊपर उठाते हैं। (अध्वगतः हरयः) = मार्ग पर चलनेवाले घोड़े-ये इन्द्रियाश्व (त्वा वहन्ति) = तुझे प्रभु के समीप प्राप्त कराते हैं। यदि हमारे इन्द्रियाश्व विषयर्पक में मग्न न होकर मार्ग पर आगे बढ़ेंगे, तो हम प्रभु को प्राप्त करेंगे ही। २. इसप्रकार यज्ञनशील बनकर इन्द्रियाश्व द्वारा मार्ग पर आगे बढ़ता हुआ व्यक्ति प्रभु को प्राप्त करता है। इस व्यक्ति के लिए कहते हैं कि तू (समुद्रं अर्णवम्) = इस गतिशील अणुसमुद्र से बने ब्रह्माण्ड से (तिरः अतिरोचसे) = पार होकर अतिशयेन देदीप्यमान होता है। [ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः]। यज्ञ करना और मार्ग पर आगे बढ़ना ही प्रभु-प्राप्ति का मार्ग है।
Essence
हम वेदमन्त्रों के साथ यज्ञ करें तथा इन्द्रियाश्यों को मार्ग से भटकने से बचाएँ। यही संसार से पार होने का मार्ग है। इसी मार्ग से प्रभु को प्राप्त होकर हम दीत जीवनवाले बन पाएंगे।
Subject
'ब्रह्मपूताः यज्ञाः', 'अध्वगतः हरयः'