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Atharvaveda - Mantra 35

Atharvaveda 13/1/35

4 Sukta
60 Mantra
13/1/35
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- उपरिष्टाद्विराड्बृहती Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
ये दे॒वा रा॑ष्ट्र॒भृतो॒ऽभितो॒ यन्ति॒ सूर्य॑म्। तैष्टे॒ रोहि॑तः संविदा॒नो रा॒ष्ट्रं द॑धातु सुमन॒स्यमा॑नः ॥

ये । दे॒वा: । रा॒ष्ट्र॒ऽभृत॑: । अ॒भित॑: । यन्ति॑ । सूर्य॑म् । तै: । ते॒ । रोहि॑त: । स॒म्ऽवि॒दा॒न: । रा॒ष्ट्रम् । द॒धा॒तु॒ । सु॒ऽम॒न॒स्यमा॑न: ॥१.३५॥

Mantra without Swara
ये देवा राष्ट्रभृतोऽभितो यन्ति सूर्यम्। तैष्टे रोहितः संविदानो राष्ट्रं दधातु सुमनस्यमानः ॥

ये । देवा: । राष्ट्रऽभृत: । अभित: । यन्ति । सूर्यम् । तै: । ते । रोहित: । सम्ऽविदान: । राष्ट्रम् । दधातु । सुऽमनस्यमान: ॥१.३५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ये देवा:) = जो देववृत्ति के पुरुष (राष्ट्रभृत:) = राष्ट्र का धारण करनेवाले हैं, वे (अभितः सूर्य यन्ति) = शीघ्रता से [अभित:-quickly] सूर्यसम् ज्योतिवाले ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। ब्रह्म की उपासनावाले ये देव ही वस्तुतः राष्ट्र का भरण कर पाते हैं। ब्रह्म की उपासना उन्हें शक्ति व पवित्रता प्राप्त कराती है। २. (तैः) = उन विद्वानों से (संविदान:) = ऐकमत्यवाला तथा (सुमनस्यमन:) = प्रीतिवाला होता हुआ (रोहितः) = तेजोदीप्त, सदावृद्ध प्रभु (ते राष्ट्रं दधातु) = तेरे राष्ट्र को धारण करें। प्रभु इन देवों के द्वारा राष्ट्र का धारण करते हैं।
Essence
राष्ट्र का धारण वे देववृत्ति के व्यक्ति ही कर पाते हैं जो प्रभु के सम्पर्क में शक्ति व पवित्रता का सम्पादन करते हैं। इनके प्रति प्रीतिवाले प्रभु इन्हें राष्ट्रधारण-शक्ति प्राप्त कराते हैं।
Subject
रोहितः देवाः