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Atharvaveda - Mantra 33

Atharvaveda 13/1/33

4 Sukta
60 Mantra
13/1/33
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
व॒त्सो वि॒राजो॑ वृष॒भो म॑ती॒नामा रु॑रोह शु॒क्रपृ॑ष्ठो॒ऽन्तरि॑क्षम्। घृ॒तेना॒र्कम॒भ्यर्चन्ति व॒त्सं ब्रह्म॒ सन्तं॒ ब्रह्म॑णा वर्धयन्ति ॥

व॒त्स: । वि॒ऽराज॑: । वृ॒ष॒भ: । म॒ती॒नाम् । आ । रु॒रो॒ह॒ । शु॒क्रऽपृ॑ष्ठ: । अ॒न्तर‍ि॑क्षम् । घृ॒तेन॑ । अ॒र्कम् । अ॒भि । अ॒र्च॒न्ति॒ । व॒त्सम् । ब्रह्म॑ । सन्त॑म् । ब्रह्म॑णा । व॒र्ध॒य॒न्ति॒ ॥१.३३॥

Mantra without Swara
वत्सो विराजो वृषभो मतीनामा रुरोह शुक्रपृष्ठोऽन्तरिक्षम्। घृतेनार्कमभ्यर्चन्ति वत्सं ब्रह्म सन्तं ब्रह्मणा वर्धयन्ति ॥

वत्स: । विऽराज: । वृषभ: । मतीनाम् । आ । रुरोह । शुक्रऽपृष्ठ: । अन्तर‍िक्षम् । घृतेन । अर्कम् । अभि । अर्चन्ति । वत्सम् । ब्रह्म । सन्तम् । ब्रह्मणा । वर्धयन्ति ॥१.३३॥

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Meaning
१. (विराजः वत्सः) = [वत्सः वसतीति] विराट् में अधिष्ठातृरूपेण निवास करनेवाला [ततो विराङजायत, विराजोऽधि पुरुषः], (मतीनां वृषभ:) = बुद्धियों का, ज्ञानों का वर्णन करनेवाला (शुक्रपृष्ठः) = देदीप्यमान् पृष्ठवाला, अर्थात् अत्यन्त तेजस्वी प्रभु (अन्तरिक्षं आरुरोह) = हमारे हृदय अन्तरिक्ष में आरोहण करता है। हम हृदय में विराट् पिण्ड द्वारा सृष्टि के निर्माता प्रभु का स्मरण करते हैं। प्रभ ही हमें बुद्धियों को प्रास कराते हैं। वे प्रभु तेजोदीस [आदित्यवर्ण] हैं। २. इस (अर्कम्) = अर्चनीय, (वत्सम्) = सर्वत्र निवासवाले व वेदज्ञान का उपदेश करनेवाले प्रभु को उपासक घृतेन मलों के क्षरण व ज्ञानदीप्ति के द्वारा (अभ्यर्चन्ति) = पूजते हैं। (ब्रह्म सन्तम्) = उपासक ज्ञानस्वरूप होते हुए प्रभु को ब्रह्मणा (वर्धयन्ति) = ज्ञान के द्वारा अपने अन्दर बढ़ाते हैं।
Essence
हम विराट् पिण्ड में निवास करनेवाले, बुद्धियों के वर्धक, तेज:पुञ्ज प्रभु का हृदयों में ध्यान करें। हम प्रभु को मलों के क्षरण व ज्ञानदीप्ति द्वारा पूजें। ब्रह्म का पूजन ब्रह्म [ज्ञान] द्वारा ही हो सकता है।
Subject
घृतेन ब्रह्मणा