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Atharvaveda - Mantra 32

Atharvaveda 13/1/32

4 Sukta
60 Mantra
13/1/32
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
उ॒द्यंस्त्वं दे॑व सूर्य स॒पत्ना॒नव॑ मे जहि। अवै॑ना॒नश्म॑ना जहि॒ ते य॑न्त्वध॒मं तमः॑ ॥

उ॒त्ऽयन् । त्वम् । दे॒व॒ । सू॒र्य॒ । स॒ऽपत्ना॑न् । अव॑ । मे॒ । ज॒हि॒ । अव॑ । ए॒ना॒न् । अश्म॑ना । ज॒हि॒ । ते॒ । य॒न्तु॒ । अ॒ध॒मम् । तम॑: ॥१.३२॥

Mantra without Swara
उद्यंस्त्वं देव सूर्य सपत्नानव मे जहि। अवैनानश्मना जहि ते यन्त्वधमं तमः ॥

उत्ऽयन् । त्वम् । देव । सूर्य । सऽपत्नान् । अव । मे । जहि । अव । एनान् । अश्मना । जहि । ते । यन्तु । अधमम् । तम: ॥१.३२॥

Meaning
१. काम-क्रोधादि शत्रओं की भौति रोग भी हमारे शत्र हैं। उदय होता हुआ सूर्य रोगकमियों को नष्ट करके इन रोगरूप शत्रुओं को नष्ट करता है। 'उद्यन्नादित्य क्रिमीन् हन्तु निम्लोचन हन्तु रश्मिभिः।' इसलिए कहते हैं कि हे (देव सूर्य) = हमारे रोगों को जीतने की कामनावाले सूर्य! (उद्यन् त्वम्) = उदय होता हुआ तू मे (सपत्नान् अवजहि) = मेरे इन रोगरूप शत्रुओं को विनष्ट कर । २.हे साधक! तू (एनान्) = शत्रुओं को अश्मना [अश्मा भवतु नस्तनूः]-पाषाण-तुल्य दृढ़ शरीर से (अवजहि) = सुदूर भगा दें। तू शरीर को दृढ़ बना। यह रोगों का शिकार हो ही न पाये। ते-वे रोगरूप सब शत्रु (अधमं तमः यन्तु) = गहन अन्धकार को प्राप्त हों-इनकी स्थिति पाताललोक में हो। ये हम तक न पहुँच पाएँ।
Essence
सूर्यकिरणों के सम्पर्क में जीवन बीताते हुए हम नीरोग शरीरवाले बनें। हमारे दृढ पारीर में रोगों का पनेपा हो ही न सके।
Subject
सूर्य की किरणों में नीरोगता

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