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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 13/1/30

4 Sukta
60 Mantra
13/1/30
Devata- अग्निः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
अ॑वा॒चीना॒नव॑ ज॒हीन्द्र॒ वज्रे॑ण बाहु॒मान्। अधा॑ स॒पत्ना॑न्माम॒कान॒ग्नेस्तेजो॑भि॒रादि॑षि ॥

अ॒वा॒चीना॑न् । अव॑ । ज॒हि॒ । इन्द्र॑ । वज्रे॑ण‍ । बा॒हु॒ऽमान् । अध॑ । स॒ऽपत्ना॑न् । मा॒म॒कान् । अ॒ग्ने । तेज॑:ऽभि: । आ । अ॒दि॒षि॒ ॥१.३०॥

Mantra without Swara
अवाचीनानव जहीन्द्र वज्रेण बाहुमान्। अधा सपत्नान्मामकानग्नेस्तेजोभिरादिषि ॥

अवाचीनान् । अव । जहि । इन्द्र । वज्रेण‍ । बाहुऽमान् । अध । सऽपत्नान् । मामकान् । अग्ने । तेज:ऽभि: । आ । अदिषि ॥१.३०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (इन्द्र) = इन्द्रियों को वश में करनेवाले (बाहुमान) = प्रशस्त भुजाओंवाले, अर्थात् शक्तिशाली साधक! तु (वज्रेण) = क्रियाशीलतारूप व्रज से (अवाचीनान्) = निम्न गतिवाले-नीचे की ओर ले जानेवाले इन काम, क्रोधादि शत्रुओं को (अवजहि) = सुदूर विनष्ट कर । जितेन्द्रियता व क्रियाशीलता हमें शत्रुओं को वश में करने योग्य बनाती है। २. (अध) = अब मैं (मामकान् सपत्नान्) = अपने शत्रुओं को (अग्ने: तेजोभिः) = उस अग्रणी प्रभु के तेजों से (आ आदिषि) = निगृहीत कर लेता हूँ। प्रभु की उपासना में उपासक प्रभु के तेज से तेजस्वी बनता है और काम, क्रोधादि शत्रुओं को निगृहीत करने में समर्थ होता है।
Essence
हम जितेन्द्रिय व क्रियाशील बनकर शत्रुओं का पराभव करें। प्रभु के तेज से तेजस्वी होकर हम शत्रुओं का निग्रह करने में समर्थ हों।
Subject
अग्नेः तेजोभिः