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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 13/1/3

4 Sukta
60 Mantra
13/1/3
Devata- मरुद्गणः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- जगती Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यू॒यमु॒ग्रा म॑रुतः पृश्निमातर॒ इन्द्रे॑ण यु॒जा प्र मृ॑णीत॒ शत्रू॑न्। आ वो॒ रोहि॑तः शृणवत्सुदानवस्त्रिष॒प्तासो॑ मरुतः स्वादुसंमुदः ॥

यू॒यम् । उ॒ग्रा: । म॒रु॒त॒: । पृ॒श्नि॒मा॒त॒र॒: । इन्द्रे॑ण । यु॒जा । प्र । मृ॒णी॒त॒ । शत्रू॑न् । आ । व॒: । रोहि॑त: । शृ॒ण॒व॒त् । सु॒ऽदा॒न॒व॒: । त्रि॒ऽस॒प्तास॑: । म॒रु॒त॒: । स्वा॒दु॒ऽसं॒मु॒द॒: ॥१.३॥

Mantra without Swara
यूयमुग्रा मरुतः पृश्निमातर इन्द्रेण युजा प्र मृणीत शत्रून्। आ वो रोहितः शृणवत्सुदानवस्त्रिषप्तासो मरुतः स्वादुसंमुदः ॥

यूयम् । उग्रा: । मरुत: । पृश्निमातर: । इन्द्रेण । युजा । प्र । मृणीत । शत्रून् । आ । व: । रोहित: । शृणवत् । सुऽदानव: । त्रिऽसप्तास: । मरुत: । स्वादुऽसंमुद: ॥१.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यूयम्) = तुम (उग्रा:) = तेजस्वी बनों, (पृश्निमातरः) [संस्पृष्टाभासाम्-पृश्निः] = ज्ञान-ज्योतियों से स्पृष्ट इस वेदवाणी को अपनी माता के समान जानों-उसकी प्रेरणा के अनुसार कार्य करते हुए उत्तम जीवनवाले बनों। (रुद्रेण युजा) = शत्रुबिद्रावक प्रभु के साथ (शत्रून् प्रमृणीत) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं को कुचल डालो। २. (रोहित:) = वे तेजपुञ्ज अथवा सर्वतोवृद्ध प्रभु (वः आशृणवत्) = तुम्हारी प्रार्थना को सुनें-तुम प्रभु का आराधन करनेवाले बनो। (सुदानव:) = शत्रुओं का खूब ही [दाप् लबने] नाश करनेवाले होओ। (त्रिषप्तासः) = कर्म, ज्ञान व उपासनारूप त्रयी में 'दो कानों, दो नासिका-छिद्रों, दो आँखों व मुख' रूप [कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्] सतर्षियों को प्रवृत्त करनेवाले बनो। (मरुतः) = मितरावी-कम बोलनेवाले-कर्मवीर, नकि वाग्वीर बनो तथा (स्वादुसंमुदः) = घर में स्वादिष्ट पदार्थों का मिलकर [सम्] आनन्द लेनेवाले होओ।
Essence
तुम्हारा शरीर तेजस्वी हो, मस्तिष्क में तुम ज्ञान की रुचिवाले बनो। प्रभु के उपासक बनकर हृदय में स्थित कामादि शत्रुओं को कुचल डालो। प्रभु का आराधन करते हुए शत्रुओं को कुचल डालो। कान आदि इन्द्रियों को 'ज्ञान, कर्म, उपासना' में प्रवृत्त करो। मितरावी बनो तथा स्वादिष्ट पदार्थों का मिलकर आनन्द लेनेवाले होओ। अकेले मत खाओ।
Subject
उग्राः पृश्निमातरः