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Atharvaveda - Mantra 28

Atharvaveda 13/1/28

4 Sukta
60 Mantra
13/1/28
Devata- अग्नि Rishi- ब्रह्मा Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
समि॑द्धो अ॒ग्निः स॑मिधा॒नो घृ॒तवृ॑द्धो घृ॒ताहु॑तः। अ॑भी॒षाड् वि॑श्वा॒षाड॒ग्निः स॒पत्ना॑न्हन्तु॒ ये मम॑ ॥

सम्ऽइ॑ध्द: । अ॒ग्नि: । स॒म्ऽइ॒धा॒न: । घृ॒तऽवृ॑ध्द: । घृ॒तऽआ॑हुत: । अ॒भी॒षाट् । वि॒श्वा॒षाट् । अ॒ग्नि: । स॒ऽपत्ना॑न् । ह॒न्तु॒ । ये । मम॑ ॥१.२८॥

Mantra without Swara
समिद्धो अग्निः समिधानो घृतवृद्धो घृताहुतः। अभीषाड् विश्वाषाडग्निः सपत्नान्हन्तु ये मम ॥

सम्ऽइध्द: । अग्नि: । सम्ऽइधान: । घृतऽवृध्द: । घृतऽआहुत: । अभीषाट् । विश्वाषाट् । अग्नि: । सऽपत्नान् । हन्तु । ये । मम ॥१.२८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अग्निः सम् इद्धः) = गतमन्त्र के अनुसार वेद के स्वाध्याय से वह अग्रणी प्रभु हमारे हृदयों में समिद्ध हुए हैं। (सम् इधान:) = सम्यक् दीप्त होते हुए ये प्रभु (तवृद्धः) = दोषों के क्षरण व ज्ञानदीप्ति द्वारा हमारे अन्दर बढ़ते हैं, (ताहुत:) = वस्तुतः प्रभु ही ज्ञानदीसि को प्राप्त करानेवाले हैं [घृतं आहुतं येन]। २. ये प्रभु ही ज्ञान देकर (अभीषाट्) = हमारे शत्रुओं का सर्वत्र पराभव करनेवाले हैं। (विश्वाषाट्) = हमारे अन्दर प्रविष्ट हो जानेवाले कामादि शत्रुओं का पराभव करनेवाले हैं। इसप्रकार (अग्निः) = ये अग्नणी प्रभु ही (ये मम) = जो मेरे शत्रु हैं उन सब (सपत्नान् हन्तु) = शत्रुओं का विनाश करें।
Essence
स्वाध्याय के द्वारा हम प्रभु के प्रकाश को हृदयों में देखने का प्रयत्न करें। दीप्स होते हुए प्रभु हमारे ज्ञान को और बढ़ाते हैं और प्रभु ही हमारे शत्रुओं का विनाश करते हैं, हमें कामादि पर विजय प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करते हैं।
Subject
'अभीषाड् विश्वाषाड्' अग्निः