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Atharvaveda - Mantra 27

Atharvaveda 13/1/27

4 Sukta
60 Mantra
13/1/27
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
वि मि॑मीष्व॒ पय॑स्वतीं घृ॒ताचीं॑ दे॒वानां॑ धे॒नुरन॑पस्पृगे॒षा। इन्द्रः॒ सोमं॑ पिबतु॒ क्षेमो॑ अस्त्व॒ग्निः प्र स्तौ॑तु॒ वि मृधो॑ नुदस्व ॥

वि । मि॒मी॒ष्व॒ । पय॑स्वतीम् । घृ॒ताची॑म् । दे॒वाना॑म् । धे॒नु: । अन॑पऽस्पृक् । ए॒षा । इन्द्र॑: ।सोम॑म् । पि॒ब॒तु॒ । क्षेम॑: । अ॒स्तु॒ । अ॒ग्नि: । प्र । स्तौ॒तु॒ । वि । मृध॑: । नु॒द॒स्व॒ ॥१.२७॥

Mantra without Swara
वि मिमीष्व पयस्वतीं घृताचीं देवानां धेनुरनपस्पृगेषा। इन्द्रः सोमं पिबतु क्षेमो अस्त्वग्निः प्र स्तौतु वि मृधो नुदस्व ॥

वि । मिमीष्व । पयस्वतीम् । घृताचीम् । देवानाम् । धेनु: । अनपऽस्पृक् । एषा । इन्द्र: ।सोमम् । पिबतु । क्षेम: । अस्तु । अग्नि: । प्र । स्तौतु । वि । मृध: । नुदस्व ॥१.२७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. वेदरूपी धेनु ज्ञानदुग्ध द्वारा हमारा पोषण करती है। इस (पयस्वतीम्) = ज्ञानदुग्ध देनेवाली दुग्ध द्वारा हमारा पोषण करनेवाली तथा (घृताचीम्) = [घृ दीसौ क्षरणे] मलों के क्षरण व ज्ञानदीप्ति द्वारा हमारे जीवनों को अलंकृत करनेवाली वेदधेनु को विमिमीष्व-विशिष्टरूप से निर्मित कर उसका उच्चारण कर [मा-to roar, sound]। (एषा) = यह (देवानां धेनु:) = देवों-देववृत्ति के पुरुषों की गाय है। (अनपस्पृक्) = यह पृथक् करने योग्य नहीं-सदा स्पर्श के योग्य है। वेद का स्वाध्याय तो नित्य करना ही है। २. एक (इन्द्र:) = जितेन्द्रिय पुरुष को चाहिए कि वह (सोमं पिबतु) = सोमशक्ति का शरीर में पान करे । सुरक्षित सोम ही ज्ञानाग्नि का इंधन बनकर ज्ञानाग्नि को दीप्त करता है, तभी वेदधेनु के दुग्धपान की रुचि उत्पन्न होती है। इसप्रकार हमारा (क्षेमः अस्तु) = कल्याण-ही कल्याण हो। (अग्निः प्रस्तौतु) = यह प्रगतिशील जीव प्रभु का स्तवन करे और (मृधः विनुदस्व) = संहार कर देनेवाले इन काम, क्रोध, लोभरूप शत्रुओं को दूर धकेल दे। प्रभु-स्तवन कामादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त कराएगा, इसप्रकार सोम का रक्षण सम्भव होगा और ज्ञानानि की दीति होकर वेदधेनु के ज्ञानदुग्ध के पान की क्षमता बढ़ेगी।
Essence
वेदधेनु का ज्ञानदुग्ध हमारा आप्यायन करता है, यह मलों के क्षरण व ज्ञानदीप्ति को प्राप्त करानेवाली है। जितेन्द्रिय पुरुष सोम का रक्षण करता हुआ ज्ञानाग्नि को दीस करता है। प्रभु-स्तवन करता हुआ यह काम, क्रोधादि शत्रुओं को अपने से दूर रखता है।
Subject
पयस्वती घृताची 'धेनुः'