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Atharvaveda - Mantra 26

Atharvaveda 13/1/26

4 Sukta
60 Mantra
13/1/26
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- विराट्परोष्णिक् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
रोहि॑तो॒ दिव॒मारु॑हन्मह॒तः पर्य॑र्ण॒वात्। सर्वो॑ रुरोह॒ रोहि॑तो॒ रुहः॑ ॥

रोहि॑त: । दिव॑म् । आ । अ॒रु॒ह॒त् । म॒ह॒त: । परि॑ । अ॒र्ण॒वात् । सर्वा॑: । रु॒रो॒ह॒ । रोह‍ि॑त: । रुह॑: ॥१.२६॥

Mantra without Swara
रोहितो दिवमारुहन्महतः पर्यर्णवात्। सर्वो रुरोह रोहितो रुहः ॥

रोहित: । दिवम् । आ । अरुहत् । महत: । परि । अर्णवात् । सर्वा: । रुरोह । रोह‍ित: । रुह: ॥१.२६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. वह (रोहितः) = तेजस्वी प्रभु महतः परि अर्णवात्-[अर्णवः agitated] महान् क्षुब्ध [तीन गतिमय] प्रकृति के अणुसमुद्र से (दिवं परि आरुहत्) = [परि वर्जने] ऊपर उठकर अपने प्रकाशमय स्वरूप में स्थित हैं। सम्पूर्ण प्रकृति के अणुसमुद्र को वे ही गति दे रहे हैं, परन्तु स्वयं शान्त हैं 'तदेजति तनेजति', 'भूतभृन्न च भूतस्थः'। २. वह (रोहितः) = तेजस्वी प्रभु (सर्वाः रुहः रोह) = संसार-वृक्ष की सब शाखाओं को जन्म देनेवाले हैं और इन सबमें व्यास हो रहे हैं। [सबका आरोहण करते हैं]।
Essence
यह रोहित प्रभु इस प्रकृति के अणुसमुद्र को गति देकर संसार का निर्माण करते हैं, परन्तु इसमें उलझते नहीं। वे प्रभु ही संसार-वृक्ष की सब शाखाओं को प्रादुर्भूत करते हैं।
Subject
दिवम् आरुहत्