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Atharvaveda - Mantra 25

Atharvaveda 13/1/25

4 Sukta
60 Mantra
13/1/25
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यो रोहि॑तो वृष॒भस्ति॒ग्मशृ॑ङ्गः॒ पर्य॒ग्निं परि॒ सूर्यं॑ ब॒भूव॑। यो वि॑ष्ट॒भ्नाति॑ पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ तस्मा॑द्दे॒वा अधि॒ सृष्टीः॑ सृजन्ते ॥

य: । रोहि॑त: । वृ॒ष॒भ: । ति॒ग्मऽशृ॑ङ्ग: । परि॑ । अ॒ग्निम् । परि॑ । सूर्य॑म् । ब॒भूव॑ । य: । वि॒ऽस्त॒भ्नाति॑ । पृ॒थि॒वीम् । दिव॑म् । च॒ । तस्मा॑त् । दे॒वा: । अधि॑ । सृष्टी॑: । सृ॒ज॒न्ते॒ ॥१.२५॥

Mantra without Swara
यो रोहितो वृषभस्तिग्मशृङ्गः पर्यग्निं परि सूर्यं बभूव। यो विष्टभ्नाति पृथिवीं दिवं च तस्माद्देवा अधि सृष्टीः सृजन्ते ॥

य: । रोहित: । वृषभ: । तिग्मऽशृङ्ग: । परि । अग्निम् । परि । सूर्यम् । बभूव । य: । विऽस्तभ्नाति । पृथिवीम् । दिवम् । च । तस्मात् । देवा: । अधि । सृष्टी: । सृजन्ते ॥१.२५॥

Meaning
१. (यः) = जो प्रभु (रोहितः) = सदा प्रवृद्ध व तेजस्वी हैं (वृषभः) = सुखों का सेचन करनेवाले व (तिग्मशः) = बड़े तीक्ष्ण ज्ञानकिरणरूप शङ्गोवाले हैं, वे प्रभु ही (अग्रिं परिबभूव) = अग्नि को (समन्तात्) = व्याप्त कर रहे हैं और (सूर्यम् परि) [बभूव] = सूर्य को व्याप्त कर रहे है। वस्तुतः प्रभु ही अग्नि में तेज के रूप से रह रहे हैं और सूर्य में वे ही 'प्रभा' के रूप में हैं। 'तेजश्चास्मि विभावसौ प्रभास्मि शशिसूर्ययोः'। यः जो प्रभ दिवं पथिवीं च-द्यलोक व प्रथिवीलोक को (विष्टभ्नाति) = थामते हैं, (तस्मात्) = उस प्रभु से ही-प्रभु की शक्ति से ही और प्रभु के अधिष्ठातृत्व में ही [अधि] (देवा:) = सब देव (सृष्टी: अधि सृजन्ते) = सृष्टियों को जन्म देते हैं। 'मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्' यह चराचर जगत् प्रभु की अध्यक्षता में ही प्रकृति से उत्पन्न होता है।
Essence
वे प्रभु तेजस्वी हैं, सुखों का वर्षण करनेवाले व तीव्र किरणरूप शृङ्गोंवाले हैं। अग्नि व सूर्यादि में प्रभु ही व्याप्त हो रहे हैं। वे प्रभु ही घुलोक व पृथिवीलोक का धारण करते हैं। सब देव प्रभु की अध्यक्षता में ही सृष्टियों को रचते हैं।
Subject
रोहितः वृषभः तिग्मशृङ्गः

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