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Atharvaveda - Mantra 24

Atharvaveda 13/1/24

4 Sukta
60 Mantra
13/1/24
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
सूर्य॒स्याश्वा॒ हर॑यः केतु॒मन्तः॒ सदा॑ वहन्त्य॒मृताः॑ सु॒खं रथ॑म्। घृ॑त॒पावा॒ रोहि॑तो॒ भ्राज॑मानो॒ दिवं॑ दे॒वः पृष॑ती॒मा वि॑वेश ॥

सूर्य॑स्य । अश्वा॑: । हर॑य: । के॒तु॒ऽमन्त॑: । सदा॑ । व॒ह॒न्ति॒ । अ॒मृता॑: । सु॒ऽखम् । रथ॑म् । घृ॒त॒ऽपावा॑ । रोहि॑त: । भ्राज॑माना: । दिव॑म् । दे॒व: । पृष॑तीम् । आ । वि॒वे॒श॒ ॥१.२४॥

Mantra without Swara
सूर्यस्याश्वा हरयः केतुमन्तः सदा वहन्त्यमृताः सुखं रथम्। घृतपावा रोहितो भ्राजमानो दिवं देवः पृषतीमा विवेश ॥

सूर्यस्य । अश्वा: । हरय: । केतुऽमन्त: । सदा । वहन्ति । अमृता: । सुऽखम् । रथम् । घृतऽपावा । रोहित: । भ्राजमाना: । दिवम् । देव: । पृषतीम् । आ । विवेश ॥१.२४॥

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Meaning
१. (सूर्यस्य) = सूर्य के (अश्वा:) = किरणरूप (अश्व हरयः) = हमारे सब रोगों का हरण करनेवाले हैं। (केतुमन्त:) = प्रकाशवाले ये किरणरूप (अश्व अमृताः) [न मृतं येभ्यः] = हमें मृत्यु व रोगों से बचाते हैं और इसप्रकार (रथम्) = शरीर-रथ को (सुखं वहन्ति) = [ख-इन्द्रियाँ] उत्तम इन्द्रियोंवाला बनाकर वहन करते हैं। उद्यन्नादित्यः कृमीन् हन्ति निम्लोचन हन्तु रश्मिभिः'। २. (घृतपावा) = इन सूर्यादि पिण्डों में दीप्ति का रक्षण करनेवाला (रोहित:) = वह तेजस्वी (भाज्रमानः) = दीप्त होता हुआ (देव:) = प्रकाशमय प्रभु (दिवम्) = इस प्रकाशमय (द्युलोक) = धुलोकस्थ सूर्य तथा (पृषतीम्) = इस 'लोहित शुक्ल, कृष्ण' [रज, सत्त्व, तमवाली] चित्रित प्रकृति में (आविवेश) = प्रविष्ट हो रहा है। वस्तुतः प्रभु से ही इन प्राकृतिक पिण्डों को बह-वह 'विभूति, श्री व क'' प्राप्त हो रहे हैं।
Essence
सूर्य की किरणें हमारे शरीर-रथ को नीरोग बनानेवाली हैं। सूर्य में इस दीप्ति को प्रभु ही स्थापित करते हैं। प्रभु प्रत्येक प्राकृतिक पिण्ड में प्रविष्ट हुए-हुए उस-उस श्री को वहाँ प्राप्त कराते हैं।

 
Subject
सूर्यस्य अश्वा: