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Atharvaveda - Mantra 23

Atharvaveda 13/1/23

4 Sukta
60 Mantra
13/1/23
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दं सदो॒ रोहि॑णी॒ रोहि॑तस्या॒सौ पन्थाः॒ पृष॑ती॒ येन॒ याति॑। तां ग॑न्ध॒र्वाः क॒श्यपा॒ उन्न॑यन्ति॒ तां र॑क्षन्ति क॒वयोऽप्र॑मादम् ॥

इ॒दम् । सद॑: । रोहि॑णी । रोहि॑तस्य । अ॒सौ । पन्था॑: । पृष॑ती । येन॑ । याति॑ । ताम् । ग॒न्ध॒र्वा: । क॒श्यपा॑: । उत् । न॒य॒न्ति॒ । क॒वय॑: । अप्र॑ऽमादम् ॥१.२३॥

Mantra without Swara
इदं सदो रोहिणी रोहितस्यासौ पन्थाः पृषती येन याति। तां गन्धर्वाः कश्यपा उन्नयन्ति तां रक्षन्ति कवयोऽप्रमादम् ॥

इदम् । सद: । रोहिणी । रोहितस्य । असौ । पन्था: । पृषती । येन । याति । ताम् । गन्धर्वा: । कश्यपा: । उत् । नयन्ति । कवय: । अप्रऽमादम् ॥१.२३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (रोहिणी) = प्रकृति (रोहितस्य) = उस तेजस्वी प्रभु का (इदं सदः) = यह घर है-निवास स्थान है। प्रभु प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान हैं। (असौ पन्थाः) = मार्ग वह है (पृषती येन याति) = यह [पृष् to give] सब पदार्थों को देनेवाली प्रकृति जिससे जाती है। प्रकृति का प्रत्येक पदार्थ पिण्ड एकदम नियमित गति से चल रहा है। जीव को भी चाहिए की वह सूर्य और चन्द्र की भौति नियमित गति से चले। 'स्वस्तिपन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव'। २. (ताम्) = उस प्रकृति को (गन्धर्वाः) = ज्ञान की वाणियों का धारण करनेवाले (कश्यपा:) = तत्त्वद्रष्टा लोग (उन्नयन्ति) = उन्नत करते हैं-अपने जीवन में उत्कर्षेण प्राप्त करते हैं-प्रकृति का ठीक प्रयोग करते हुए वे उसे उचित आदर देते हैं। ताम्-उस प्रकृति को (कवयः) = ज्ञानी लोग (अप्रमादम्) = प्रमादशून्य होकर (रक्षन्ति) = रक्षित करते हैं। प्रकृति के बने हुए इस शरीर के रक्षण को भी वे धर्म समझते हैं और इस शरीर की बड़ी सावधानी से रक्षा करते हैं |

 
Essence
प्रकृति में सर्वत्र प्रभु का वास है। प्रकृति के बने सूर्यादि सब पिण्डों को प्रभु ही प्रकाश प्राप्त कराते हैं। इन सूर्य-चन्द्रादि की भाँति नियमित मार्ग का ये अनुसरण करते हैं। प्रकृति के ठीक प्रयोग से वे उसका आदर करते हैं और शरीर-रथ का पूर्णरूपेण रक्षण करते हैं।
Subject
रोहिणी रोहितस्य इदं सदः