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Atharvaveda - Mantra 22

Atharvaveda 13/1/22

4 Sukta
60 Mantra
13/1/22
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
अनु॑व्रता॒ रोहि॑णी॒ रोहि॑तस्य सू॒रिः सु॒वर्णा॑ बृह॒ती सु॒वर्चाः॑। तया॒ वाजा॑न्वि॒श्वरू॑पां जयेम॒ तया॒ विश्वाः॒ पृत॑ना अ॒भि ष्या॑म ॥

अनु॑ऽव्रता । रोहि॑णी । रोहि॑तस्य । सू॒रि: । सु॒ऽवर्णा॑ । बृ॒ह॒ती । सु॒ऽवर्चा॑: । तया॑ । वाजा॑न् । वि॒श्वऽरू॑पान् । ज॒ये॒म॒ । तया॑ । विश्वा॑: । पृत॑ना: । अ॒भि । स्या॒म॒ ॥१.२२॥

Mantra without Swara
अनुव्रता रोहिणी रोहितस्य सूरिः सुवर्णा बृहती सुवर्चाः। तया वाजान्विश्वरूपां जयेम तया विश्वाः पृतना अभि ष्याम ॥

अनुऽव्रता । रोहिणी । रोहितस्य । सूरि: । सुऽवर्णा । बृहती । सुऽवर्चा: । तया । वाजान् । विश्वऽरूपान् । जयेम । तया । विश्वा: । पृतना: । अभि । स्याम ॥१.२२॥

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Meaning
१. "रोहित' प्रभु हैं, 'रोहिणी' प्रकृति है, प्रभु की पत्नी के रूप में यह प्रकृति है। प्रभु महादेव है तो यह पार्वती है, प्रभु विष्णु है तो यह लक्ष्मी है, प्रभु ब्रह्मा हैं तो यह सरस्वती है। जब 'रोहिणी' सब देवों को जन्म देनेवाली प्रकृति (रोहितस्य) = उस तेजस्वी प्रभु के (अनुव्रता) = अनुकूल व्रतवाली होती है, अर्थात् प्रकृति के सब पदार्थ हमें प्रभु की ओर ले-चलनेवाले होते हैं, उस समय यह (सूरिः) = ज्ञानवाली, (सुर्वणा) = उत्तमता से प्रभु के गुणों का वर्णन करनेवाली, (बृहती) = हमारे हृदयों को विशाल बनानेवाली तथा (सुवर्चा:) = उत्तम वर्चस्वाली होती है। यदि हम प्रकृति के भोगों में न फंसकर प्रकृति के पदार्थों में प्रभु की महिमा को देखते हुए उनका सदुपयोग करें तो यह प्रकृति हमें 'ज्ञानी, प्रभु-स्तवन की वृत्तिवाला, विशाल हृदय व वर्चस्वी' बनाती है। २. (तया) = उस प्रकृति से हम (विश्वरूपां बाजान् जयेम) = अङ्ग-प्रत्यङ्गों को रूपसम्पन्न बनानेवाली शक्तियों का विजय करें। प्रकृति के पदार्थों के ठीक प्रयोग से हमारे सब अङ्ग सशक्त व सुरूप बनते हैं। (तया) = उस प्रभु की अनुव्रता प्रकृति से हम (विश्वाः पृतना:) = सब शत्रुओं को (अभिष्याम) = अभिभूत करें। प्रकृति का युक्त प्रयोग होने पर यह हमें प्रभु की ओर ले-चलती है। उस समय ये हमें विजयी-ही-विजयी बनाती है।
Essence
हम प्रकृति का इसप्रकार से प्रयोग करें कि यह हमें प्रभु की ओर ले-चलनेवाली हो। उस समय हम 'ज्ञानी, स्तोता, विशाल हृदय व तेजस्वी' बनेंगे। हम इस प्रकृति के द्वारा सब शक्तियों पर विजय करते हुए सब शत्रुओं को जीतनेवाले बनेंगे।
Subject
रोहितस्य अनुव्रता रोहिणी