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Atharvaveda - Mantra 21

Atharvaveda 13/1/21

4 Sukta
60 Mantra
13/1/21
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- आर्षी निचृद्गायत्री Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यं त्वा॒ पृष॑ती॒ रथे॒ प्रष्टि॒र्वह॑ति रोहित। शु॒भा या॑सि रि॒णन्न॒पः ॥

यम. । त्वा॒ । पृष॑ती । रथे॑ । प्रष्टि॑: । वह॑ति । रो॒हि॒त॒ । शु॒भा । या॒सि॒ । रि॒णन् । अ॒प: ॥१.२१॥

Mantra without Swara
यं त्वा पृषती रथे प्रष्टिर्वहति रोहित। शुभा यासि रिणन्नपः ॥

यम. । त्वा । पृषती । रथे । प्रष्टि: । वहति । रोहित । शुभा । यासि । रिणन् । अप: ॥१.२१॥

Meaning
१. हे (रोहित) = सदावृद्ध, तेजस्विन् प्रभो! (यं त्वा) = जिस आपको (रथे) = इस शरीररूप रथ में (पृषती) = [to weary, vex. pain] प्राकृतिक भोगविलास में कष्ट को अनुभव करनेवाला अतएव (प्रष्टिः) = [bystander] प्राकृतिक भोगों से उपराम हुआ-हुआ [एक ओर होकर खड़ा हुआ] यह साधक (वहति) = धारण करता है तब आप (शुभा यासि) = उसके लिए सब शुभों को प्राप्त कराते हैं और (अप: रिणन्) = उसके रेत:कणों को शरीर में ही प्रेरित करते हैं।
Essence
प्रकृति चमकती है, जीव का उसकी ओर झुकाव होना स्वाभाविक है, परन्तु जब मनुष्य प्राकृतिक भोगों में विनाश अनुभव करता है तब वह प्रभु की ओर झुकता है। प्रभु उसे सब सखों को प्राप्त कराते हैं। अब यह साधक शरीरस्थ रेत:कणों की ऊर्ध्वगति के लिए यत्नशील होता है।
Subject
पृषती

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