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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 13/1/20

4 Sukta
60 Mantra
13/1/20
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
परि॑ त्वा धात्सवि॒ता दे॒वो अ॒ग्निर्वर्च॑सा मि॒त्रावरु॑णाव॒भि त्वा॑। सर्वा॒ अरा॑तीरव॒क्राम॒न्नेही॒दं रा॒ष्ट्रम॑करः सु॒नृता॑वत् ॥

परि॑ । त्वा॒ । धा॒त् । स॒वि॒ता । दे॒व: । अ॒ग्नि: । वर्च॑सा । मि॒त्रावरु॑णौ । अ॒भि । त्वा॒ । सर्वा॑: । अरा॑ती: । अ॒व॒ऽक्राम॑न् । आ । इ॒हि॒। इ॒दम् । रा॒ष्ट्रम् । अ॒क॒र॒: । सू॒नृता॑ऽवत् ॥१.२०॥

Mantra without Swara
परि त्वा धात्सविता देवो अग्निर्वर्चसा मित्रावरुणावभि त्वा। सर्वा अरातीरवक्रामन्नेहीदं राष्ट्रमकरः सुनृतावत् ॥

परि । त्वा । धात् । सविता । देव: । अग्नि: । वर्चसा । मित्रावरुणौ । अभि । त्वा । सर्वा: । अराती: । अवऽक्रामन् । आ । इहि। इदम् । राष्ट्रम् । अकर: । सूनृताऽवत् ॥१.२०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. वह (सविता देवः) = उत्पादक व प्रेरक [सविता] तथा प्रकाशमय [देव] (त्वा) = तुझे (परिधात्) = सब ओर से धारण करता है। प्रभु की प्रेरणा को सुनता और निर्माण के कार्यों में प्रवृत्त होता तथा स्वाध्याय द्वारा विकासमय जीवनवाला बनना ही धारण का मार्ग है। इसी से हम कभी भी शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होते। (अग्निः) = वह अग्रणी प्रभु तुझे (वर्चसा) = वर्चस्-रोग निरोधक शक्ति से धारण करें। हममें आगे बढ़ने की भावना होगी तो हम रोगों से आक्रान्त होंगे ही नहीं। (मित्रावरुणौ) = स्नेह व निर्दोषता के भाव (त्वा) = तुझे (अभि) = शरीर व मस्तिष्क दोनों के दृष्टिकोण से रक्षित करें। द्वेष से उत्पन्न होनेवाले विष शरीर व मस्तिष्क पर घातक प्रभाव डालते हैं। २. इसप्रकार 'सविता, देव, अग्नि, मित्र व वरुण' की आराधना करता हुआ तू (सर्वा: अराति:) = सब शत्रुओं को अवक्रामन् नीचे पादाक्रान्त करता हुआ (एहि) = गति कर। तेरे सब कर्तव्य शत्रुओं को कुचल कर किये जाएँ। 'काम, क्रोध, लोभ' से प्रेरित होकर तेरी गति न हो। इसप्रकार (इदं राष्ट्रम्) = इस शरीररूप राष्ट्र को (सूनृतावत् अकर:) = प्रिय, दुःखनाशक सत्य [सू ऊन् ऋत] वाणीवाला कर । तेरे जीवन में सत्य-ही-सत्य हो-असत्य का अंश भी न हो।
Essence
हम 'सविता' के आराधक बनकर निर्माण के कार्यों में प्रवृत्त हों, 'देव' की आराधना करते हुए प्रकाशमय जीवनवाले बनें। आगे बढ़ने की भावना हमें तेजस्वी बनाए। स्नेह व निद्रेषिता हमारे शरीर व मस्तिष्क का धारण करें। 'काम, क्रोध, लोभ' को कुचलकर हम कर्मों में प्रवृत्त हों। हमारा जीवन सत्यमय हो।
Subject
सूनृतावत् राष्ट्र