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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 13/1/2

4 Sukta
60 Mantra
13/1/2
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
उद्वाज॒ आ ग॒न्यो अ॒प्स्वन्तर्विश॒ आ रो॑ह॒ त्वद्यो॑नयो॒ याः। सोमं॒ दधा॑नो॒ऽप ओष॑धी॒र्गाश्चतु॑ष्पदो द्वि॒पद॒ आ वे॑शये॒ह ॥

उत् । वाज॑: । आ । ग॒न् । य: । अ॒प्ऽसु । अ॒न्त: । विश॑: । आ । रो॒ह॒ । त्वत्ऽयो॑नय: । या: । सोम॑म् । दधा॑न: । अ॒प: । ओष॑धी: । गा: । चतु॑:ऽपद: । द्वि॒ऽपद॑: । आ । वे॒श॒य॒ । इह॥१.२॥

Mantra without Swara
उद्वाज आ गन्यो अप्स्वन्तर्विश आ रोह त्वद्योनयो याः। सोमं दधानोऽप ओषधीर्गाश्चतुष्पदो द्विपद आ वेशयेह ॥

उत् । वाज: । आ । गन् । य: । अप्ऽसु । अन्त: । विश: । आ । रोह । त्वत्ऽयोनय: । या: । सोमम् । दधान: । अप: । ओषधी: । गा: । चतु:ऽपद: । द्विऽपद: । आ । वेशय । इह॥१.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (यः अप्सु अन्त:) = जो तू सदा कार्यों में निवासवाला है, वह (वाज:) = शक्तिशाली तू (उद् आगन) = उन्नत-उदित-उन्नत हुआ है। (त्वत् योनयः याः विश:) = तेरे घर में रहनेवाली जो प्रजाएँ हैं, उन्हें आरोह [आरोहय]-उन्नत करनेवाला बन। २. (यः सोमं दधान:) = जो तू सोम-शक्ति का धारण करनेवाला है, वह तू (अपः ओषधी: गा:) = जलों, ओषधियों तथा गोदुग्ध का सेवन करनेवाला बन [गौ:-गोदुग्ध] । (इह) = यहाँ इस घर में (चतुष्पदः द्विपदः आवेशय) = चार पाँववाले गौ आदि पशुओं व मनुष्यों का तू प्रवेश करानेवाला हो-सम्यक् निवास करानेवाला हो।
Essence
कर्तव्य कर्मों में तत्पर बनकर हम शक्तिशाली बनते हुए उन्नत हों। घर में सबकी उन्नति के लिए यलशील हों। शरीर में शक्ति का रक्षण करते हुए जलों, ओषधियों, वनस्पतियों व गोदुग्ध का ही सेवन करें। घर में गौओं व सब घरवालों का ध्यान करें।
Subject
उद् वाजः आगन्