Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 18

Atharvaveda 13/1/18

4 Sukta
60 Mantra
13/1/18
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- पञ्चपदा परशाक्वराभुरिक्ककुम्मत्यतिजगती Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
वाच॑स्पत ऋ॒तवः॒ पञ्च॒ ये नौ॑ वैश्वकर्म॒णाः परि॒ ये सं॑बभू॒वुः। इ॒हैव प्रा॒णः स॒ख्ये नो॑ अस्तु॒ तं त्वा॑ परमेष्ठि॒न्परि॒ रोहि॑त॒ आयु॑षा॒ वर्च॑सा दधातु ॥

प॒ते॒ । ऋ॒तव॑: । पञ्च॑ । ये । नौ॒ । वै॒श्व॒ऽक॒र्म॒णा । परि॑ । ये । स॒म्ऽब॒भू॒वु: । परि॑। रोहि॑त: । आयु॑षा । वर्च॑सा । द॒धा॒तु॒ ॥१.१८॥

Mantra without Swara
वाचस्पत ऋतवः पञ्च ये नौ वैश्वकर्मणाः परि ये संबभूवुः। इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन्परि रोहित आयुषा वर्चसा दधातु ॥

पते । ऋतव: । पञ्च । ये । नौ । वैश्वऽकर्मणा । परि । ये । सम्ऽबभूवु: । परि। रोहित: । आयुषा । वर्चसा । दधातु ॥१.१८॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. हे (वाचस्पते) = वेदज्ञान के स्वामिन् प्रभो! ये (पञ्च ऋतवः) = ['पञ्चतव: हेमन्तशिशिरयोः समासेन'-ऐ ब्रा०'] जो पाँच ऋतुएँ हैं, वे नौ-हमारे लिए (वैश्वकर्मणा:) = सब ऋतुओं के अनुकूल कर्मों की साधक हों। ये ऋतुएँ वे हों (ये) = जोकि [नौ] (परिसंम्बभूवः) = हमारे चारों ओर सम्यक् रूप में होती हैं। ऋतुओं का विपर्यय हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक न हो। २. इसप्रकार (इह एव) = इस जीवन में ही (प्राण:) = वह प्राणों-का-प्राण प्रभु [स उ प्राणस्य प्राण:] (नः सख्ये अस्तु) = हमारी मित्रता में हो। हम सदा प्रभु के सखा बन पाएँ। हे परमेष्ठिन्!-परम स्थान में स्थित प्रभो! (तं त्वा) = उन आपको (रोहित:) = तेजस्वी होता हुआ यह उपासक (आयुषा वर्चसा) = दीर्घजीवन व वर्चस् के साथ (परिदधातु) = अपने चारों ओर धारण करे। आपको चारों ओर अनुभव करता हुआ अपने को सुरक्षित जानने से निर्भय हो।
Essence
सब ऋतुएँ हमारे अनुकूल हों। हम सब कौ को ऋतुओं के अनुसार करनेवाले हों। प्रभु की मित्रता में हम निर्भय हों।
Subject
ऋतवः वैश्वकर्मणाः