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Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 13/1/17

4 Sukta
60 Mantra
13/1/17
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- पञ्चपदा ककुम्मती जगती Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
वाच॑स्पते पृथि॒वी नः॑ स्यो॒ना स्यो॒ना योनि॒स्तल्पा॑ नः सु॒शेवा॑। इ॒हैव प्रा॒णः स॒ख्ये नो॑ अस्तु॒ तं त्वा॑ परमेष्ठि॒न्पर्य॒ग्निरायु॑षा॒ वर्च॑सा दधातु ॥

वाच॑: । प॒ते॒ । पृ॒थि॒वी । न॒: । स्यो॒ना । स्यो॒ना: । योनि॑: । तल्पा॑ । न॒: । सु॒ऽशेवा॑ । इ॒ह । ए॒व । प्रा॒ण: । स॒ख्ये । न॒: । अ॒स्तु॒ । तम् । त्वा॒ । प॒र॒मे॒ऽस्थि॒न्। परि॑ । अ॒ग्नि: ।आयु॑षा । वर्च॑सा । द॒धा॒तु॒ ॥१.१७॥

Mantra without Swara
वाचस्पते पृथिवी नः स्योना स्योना योनिस्तल्पा नः सुशेवा। इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन्पर्यग्निरायुषा वर्चसा दधातु ॥

वाच: । पते । पृथिवी । न: । स्योना । स्योना: । योनि: । तल्पा । न: । सुऽशेवा । इह । एव । प्राण: । सख्ये । न: । अस्तु । तम् । त्वा । परमेऽस्थिन्। परि । अग्नि: ।आयुषा । वर्चसा । दधातु ॥१.१७॥

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Meaning
१. हे (वाचस्पते) = वेदवाणी के स्वामिन् प्रभो! आपसे दी गई इस वेदवाणी को हम देखें और उसके अनुसार जीने का प्रयत्न करें। ऐसा करने पर (पृथिवी नः स्योना) = यह पृथिवी हमारे लिए सुखकर हो। (योनिः स्योना) = घर सुख देनेवाला हो। (न: तल्पा सुशेवा) = हमारा यह सोने का मंच भी सुख देनेवाला हो। सब वस्तुओं का ठीक विनियोग करते हुए हम सुखी हों। २. (इह एव) = यहाँ-इस मानव-जीवन में ही (प्राण:) = वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्राणभूत प्रभु (नः सख्ये अस्तु) = हमारी मित्रता में हो-हम प्रभु के सखा बन पाएँ। हे परमेष्ठिन्! परम स्थान में स्थित प्रभो! (तं त्वा) = उस आपको (अग्निः) = यह प्रगतिशील जीव (आयुषा वर्चसा) = आयुष्य और वर्चस् के साथ (परिदधातु) = अपने हृदय में धारण करे अथवा अपने चारों ओर धारण करे, आपसे अपने को सुरक्षित समझे। चारों ओर आपकी सत्ता को अनुभव करता हुआ निर्भय हो।
Essence
प्रभप्रदत्त वेदज्ञान को अपनाने पर ये पृथिवी, घर व शय्या सब हमारे लिए सुखकर होंगे। प्रभु हमारे मित्र होंगे। हम प्रगतिशील बनकर दीर्घजीवन व शक्ति के साथ प्रभु को अपने हृदयों में धारण करनेवाले होंगे।
Subject
'प्रथिवी-योनिः तल्पा' स्योना सुशेवा