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Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 13/1/14

4 Sukta
60 Mantra
13/1/14
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिपदा पुरःपरशाक्वरा विपरीतपादलक्ष्मा पङ्क्तिः Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
रोहि॑तो य॒ज्ञं व्यदधाद्वि॒श्वक॑र्मणे॒ तस्मा॒त्तेजां॒स्युप॑ मे॒मान्यागुः॑। वो॒चेयं॑ ते॒ नाभिं॒ भुव॑न॒स्याधि॑ म॒ज्मनि॑ ॥

रोहि॑त: । य॒ज्ञम् । वि । अ॒द॒धा॒त् । वि॒श्वऽक॑र्मणे । तस्मा॑त् । तेजां॑सि । उप॑ । मा॒ । इ॒मानि॑। आ । अ॒गु॒: । वो॒चेय॑म् । ते॒ । नाभि॑म् । भुव॑नस्य । अधि॑ । म॒ज्मनि॑॥१.१४॥

Mantra without Swara
रोहितो यज्ञं व्यदधाद्विश्वकर्मणे तस्मात्तेजांस्युप मेमान्यागुः। वोचेयं ते नाभिं भुवनस्याधि मज्मनि ॥

रोहित: । यज्ञम् । वि । अदधात् । विश्वऽकर्मणे । तस्मात् । तेजांसि । उप । मा । इमानि। आ । अगु: । वोचेयम् । ते । नाभिम् । भुवनस्य । अधि । मज्मनि॥१.१४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (रोहितः) = उस तेजस्वी, सदावृद्ध प्रभु ने (विश्वकर्मणे) = इस सृष्टिरूप कर्म के लिए (यज्ञं व्यदधात्) = यज्ञ का विधान किया। यज्ञसहित ही प्रजाओं को जन्म देकर यह कहा कि इस यज्ञ से ही तुम फूलो-फलोगे। यही तुम्हारी इष्टकामनाओं को पूर्ण करेगा। प्रभु द्वारा विहित (तस्मात्) = उस यज्ञ से ही (इमानि तेजांसि) = ये तेज (मा) = मुझे (उप आगुः) = समीपता से प्राप्त होते हैं। यज्ञ से विपरीत भोगवृत्ति है। यह भोगवृत्ति ही सब तेजों के विनाश का कारण बनती है। २. हे प्रभो! (अधि मज्यनि) = [मज्मनि बलनाम-नि० २.९] बल के निमित (ते भुवनस्य नाभिम्) = आपके इस यज्ञ को-भुवननाभि को ('अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः' वोचेयम्) = अपने जीवन से कहूँ, अर्थात् यज्ञशील बनकर बल व तेज को प्राप्त करूँ।
Essence
यज्ञ ही सृष्टिचक्र का आधार है। यही हमें तेजस्वी बनाता है। यज्ञ से विपरीत भोगवृत्ति तेजोविनाश का कारण बनती है।
Subject
यज्ञ व तेजस्विता