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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 13/1/11

4 Sukta
60 Mantra
13/1/11
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वो रोहि॑तो॒ अधि॒ नाके॑ अस्था॒द्विश्वा॑ रू॒पाणि॑ ज॒नय॒न्युवा॑ क॒विः। ति॒ग्मेना॒ग्निर्ज्योति॑षा॒ वि भा॑ति तृ॒तीये॑ चक्रे॒ रज॑सि प्रि॒याणि॑ ॥

ऊ॒र्ध्व: । रोहि॑त: । अधि॑ । नाके॑ । अ॒स्था॒त् । विश्वा॑ । रू॒पाणि॑ । ज॒नय॑न् । युवा॑ । क॒वि: । ति॒ग्मेन॑ ।‍ अ॒ग्नि: । ज्योति॑षा । वि । भा॒ति॒ । तृ॒तीये॑ । च॒क्रे॒ । रज॑सि । प्रि॒याणि॑ ॥१.११॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वो रोहितो अधि नाके अस्थाद्विश्वा रूपाणि जनयन्युवा कविः। तिग्मेनाग्निर्ज्योतिषा वि भाति तृतीये चक्रे रजसि प्रियाणि ॥

ऊर्ध्व: । रोहित: । अधि । नाके । अस्थात् । विश्वा । रूपाणि । जनयन् । युवा । कवि: । तिग्मेन ।‍ अग्नि: । ज्योतिषा । वि । भाति । तृतीये । चक्रे । रजसि । प्रियाणि ॥१.११॥

Meaning
१. (ऊर्ध्व:) = 'सत्त्व, रज, तम' रूपगुणवाली त्रिगुणमयी प्रकृति को धारण करता हुआ भी उससे ऊपर उठा हुआ ('भूतभृन्न च भूतस्थ:' रोहितः) = तेजस्वी, सदा वृद्ध प्रभु (नाके) = मोक्षसुख में (अधि अस्थात्) = अधिष्ठातृरूपेण वर्तमान हैं। वे प्रभु (विश्वा रूपाणि जनयन्) = सब रूपों को प्रादुर्भूत करते हैं। (युवा) = सब बुराइयों को दूर करनेवाले व अच्छाइयों को हमारे साथ मिलानेवाले (कवि:) = क्रान्तप्रज्ञ है-सृष्टि के आरम्भ में वेदज्ञान के रूप में सब सत्यविद्याओं का उपदेश करते हैं। २. वह (अग्नि:) = अग्रणी प्रभु (तिग्मेन ज्योतिषा) = तीव्र ज्योति से विभाति-दीस हैं-वहाँ प्रकाश-ही-प्रकाश है। 'आदित्यवरुणं तमसः परस्तात्'-अन्धकार से परे हैं। वे प्रभु ही (ततीये रजसि) = तृतीय लोक में-'तृतीये धामन्' तम व रजस् से ऊपर उठकर सत्त्व में पहुँचने पर पृथिवी व अन्तरिक्ष से ऊपर उठकर धुलोक में पहुँचने पर-पाषाणों की निष्क्रियता व वायु की चंचलता से ऊपर उठकर सूर्य की दीसि में पहुँचने पर (प्रयाणि चक्रे) = हमारे लिए सब आनन्दों को करते हैं।
Essence
प्रभु मोक्ष में अधिष्ठातृरूपेण बर्तमान हैं। सब रूपों को प्रादुर्भूत करते हुए बुराइयों को हमसे दूर करके अच्छाइयों को मिलाते हुए क्रान्तप्रज्ञ वे प्रभु हैं। तीव्र ज्योति से प्रकाशमान वे प्रभु ही मोक्षसुखों को प्राप्त करानेवाले हैं।
Subject
अधि नाके अस्थात्

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