Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 13/1/10

4 Sukta
60 Mantra
13/1/10
Devata- अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अध्यात्म प्रकरण सूक्त
Mantra with Swara
यास्ते॒ विश॒स्तप॑सः संबभू॒वुर्व॒त्सं गा॑य॒त्रीमनु॒ ता इ॒हागुः॑। तास्त्वा॑ विशन्तु॒ मन॑सा शि॒वेन॒ संमा॑ता व॒त्सो अ॒भ्येतु॒ रोहि॑तः ॥

या: । ते॒ । विश॑: । तप॑स: । स॒म्ऽब॒भू॒वु: । व॒त्सम् । गा॒य॒त्रीम् । अनु॑ । ता: । इ॒ह । आ । अ॒गु॒: । ता: । त्वा॒ । आ । वि॒श॒न्तु॒ । मन॑सा । शि॒वेन॑ । सम्ऽमा॑ता । व॒त्स: । अ॒भि । ए॒तु॒ । रोहि॑त: ॥१.१०॥

Mantra without Swara
यास्ते विशस्तपसः संबभूवुर्वत्सं गायत्रीमनु ता इहागुः। तास्त्वा विशन्तु मनसा शिवेन संमाता वत्सो अभ्येतु रोहितः ॥

या: । ते । विश: । तपस: । सम्ऽबभूवु: । वत्सम् । गायत्रीम् । अनु । ता: । इह । आ । अगु: । ता: । त्वा । आ । विशन्तु । मनसा । शिवेन । सम्ऽमाता । वत्स: । अभि । एतु । रोहित: ॥१.१०॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. हे प्रभो! (या:) = जो (ते विश:) = तेरी प्रजाएँ (तपसः संबभूवुः) = तप के साथ मिलकर होती हैं, अर्थात् जो प्रजाएँ तपस्वी जीवनवाली होती हैं (ता:) = वे प्रजाएँ (इह) = यहाँ-इस जीवन में (वत्सम्) = [बसति] सर्वत्र निवासवाले [बदति] वेदज्ञान का उपदेश देनेवाले प्रभु को तथा (गायत्रीम्) = प्रभु से दी जानेवाली [गया: प्राणः, तान् तत्रे] प्राणों की रक्षिका वेदवाणी के (अनु अगुः) = अनुकूलता से प्राप्त होते हैं। ये तपस्वी प्रभु का स्मरण करते हैं और वेदवाणी से कर्तव्य ज्ञान प्राप्त करके उसका आचरण करते हैं। हे प्रभो! (ता:) = वे प्रजाएँ (शिवेन मनसा) = कल्याणकर मन से (त्वा विशन्तु) = तुझमें प्रवेश करें। इन प्रजाओं को वह प्रभु (अभ्येतु) = आभिमुख्येन प्रास हो जो (संमाता) = सम्यक् निर्माण करनेवाला है, (वत्सः) = सर्वव्यापक है व वेदवाणी का उच्चारण करनेवाला है, (रोहित:) = सदा वृद्ध व तेजस्वी है।
Essence
हम तपस्वी जीवनवाले हों, प्रभु-स्मरण करें, वेदवाणी को अपनाएँ, शिव मनवाले बनकर प्रभु में प्रवेश करनेवाले हों। प्रभु "संमाता हैं, वत्स हैं, रोहित है'। इसप्रकार स्मरण करते हुए हम भी निर्माण करनेवाले हों। ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करें व तेजस्वी बनें।
Subject
संमाता वत्सः रोहित: