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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 12/5/6

5 Sukta
73 Mantra
12/5/6
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- अथर्वाचार्यः Chhanda- साम्न्युष्णिक् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
अप॑ क्रामति सू॒नृता॑ वी॒र्यं पुण्या॑ ल॒क्ष्मीः ॥

अप॑ । क्रा॒म॒ति॒ । सू॒नृता॑ । वी॒र्य᳡म्। पुण्या॑ । ल॒क्ष्मी: ॥५.६॥

Mantra without Swara
अप क्रामति सूनृता वीर्यं पुण्या लक्ष्मीः ॥

अप । क्रामति । सूनृता । वीर्यम्। पुण्या । लक्ष्मी: ॥५.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ताम्) = उस (ब्रह्मगवीम्) = ब्रह्मगवी को-(आददानास्य) = छोन लेनेवाले अथवा छिन्न करनेवाले [दाप लवने] तथा (ब्राह्मणम्) = इस ब्रह्मगवी से दिये जानेवाले ज्ञान के अधिपति ब्राह्मण को (जिनत:) = सतानेवाले [ज्या वयोहानी] (क्षत्रिस्य) = क्षत्रिय की (सूनृता) = प्रिय सत्यवाणी (अपक्रामति) = दूर भाग जाती है-इसके जीवन में इस सूनुता का स्थान नहीं रहता। (वीर्यम्) = इसका वीर्य नष्ट हो जाता है तथा (पुण्या लक्ष्मी:) = पुण्य लक्ष्मी इससे दूर चली जाती है।
Essence
यदि एक क्षत्रिय इस वेदधनु का छेदन करता है और इसके स्वामी ब्राह्मण को सताता है तो वह 'सत्य, बल व पुण्य लक्ष्मी' से रहित हो जाता है।

 
Subject
सत्य, बल व लक्ष्मी