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Atharvaveda - Mantra 44

Atharvaveda 12/5/44

5 Sukta
73 Mantra
12/5/44
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- अथर्वाचार्यः Chhanda- पिपीलिकमध्यानुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
वि॑वा॒हां ज्ञा॒तीन्त्सर्वा॒नपि॑ क्षापयति ब्रह्मग॒वी ब्र॑ह्म॒ज्यस्य॑ क्ष॒त्रिये॒णापु॑नर्दीयमाना ॥

वि॒ऽवा॒हान् । ज्ञा॒तीन् । सर्वा॑न् । अपि॑ । क्षा॒प॒य॒ति॒ । ब्र॒ह्म॒ऽग॒वी । ब्र॒ह्म॒ऽज्यस्य॑ । क्ष॒त्रिये॑ण । अपु॑न:ऽदीयमाना ॥९.६॥

Mantra without Swara
विवाहां ज्ञातीन्त्सर्वानपि क्षापयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य क्षत्रियेणापुनर्दीयमाना ॥

विऽवाहान् । ज्ञातीन् । सर्वान् । अपि । क्षापयति । ब्रह्मऽगवी । ब्रह्मऽज्यस्य । क्षत्रियेण । अपुन:ऽदीयमाना ॥९.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. पीड़ित की गई ब्रह्मगवी (अस्य पितबन्धु छिनत्ति) = पैतृक सम्बन्धों को छिन्न कर डालती है, (मातृबन्ध पराभावयति) = मातृपक्षवालों को भी पराभूत करती है। यह (ब्रह्मगवी) = वेदवाणी यदि (क्षत्रियेण) = क्षत्रिय से (अपुन: दीयमाना) = फिर वापस लौटाई न जाए तो यह (ब्रह्मज्यस्य) = ब्रह्मघाती के (विवाहान्) = विवाहों को व (सर्वान् ज्ञातीन् अपि) = सब रिश्तेदारों को भी (क्षापयति) = नष्ट कर देती है। २. (यः) = जो (क्षत्रियः) = क्षत्रिय (एवं विदुषः ब्रह्मणस्य) = इसप्रकार ज्ञानी ब्राह्मण की (गाम् आदते) = इस ब्रह्मगवी को छीन लेता है, वह (अपरापरणः भवति) = सहायक से रहित हो जाता है अथवा पुराणों व नयों से रहित हो जाता है-सब इसका साथ छोड़ जाते हैं और (क्षीयते) = यह नष्ट हो जाता है। यह छिन्ना ब्रह्मगवी (एनम्) = इसको (अवास्तुम्) = घर-बार से रहित, (अस्वगम्) = [अ स्व ग] निर्धन व (अप्रजसम्) = सन्तानरहित (करोति) = कर देती है।
Essence
छिन्ना ब्रह्मगवी ब्रह्मज्य के सब वंश को ही समाप्त कर देती है।
Subject
वंशविनाश