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Atharvaveda - Mantra 41

Atharvaveda 12/5/41

5 Sukta
73 Mantra
12/5/41
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- अथर्वाचार्यः Chhanda- भुरिक्साम्न्यनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्निः क्र॒व्याद्भू॒त्वा ब्र॑ह्मग॒वी ब्र॑ह्म॒ज्यं प्र॒विश्या॑त्ति ॥

अ॒ग्नि: । क्र॒व्य॒ऽअत् । भू॒त्वा । ब्र॒ह्म॒ऽग॒वी । ब्र॒ह्म॒ऽज्यम्‌ । प्र॒ऽविश्य॑ । अ॒त्ति॒ ॥९.३॥

Mantra without Swara
अग्निः क्रव्याद्भूत्वा ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यं प्रविश्यात्ति ॥

अग्नि: । क्रव्यऽअत् । भूत्वा । ब्रह्मऽगवी । ब्रह्मऽज्यम्‌ । प्रऽविश्य । अत्ति ॥९.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (तस्याः) = उस ब्रह्मगवी का (आहननम्) = मारना (कृत्या) = अपनी हिंसा करना है, (आशसनम्) = उसका टुकड़े करना (मेनि:) = वज्राघात के समान है, (ऊबध्यम्) = [दुर् बन्धनम्] उसको बुरी तरह से बाँधना (वलग:) = [वल+ग] हलचल की ओर ले-जानेवाला है-प्रजा में विप्लव को पैदा करनेवाला है। २. (परिह्रुता) = [हु अपनयने] अपनीता व चुरा ली गई यह ब्रह्मगवी (अस्व-गता) = निर्धनता की ओर गम वाली होती है-यह निर्धनता को उत्पन्न कर देती है। उस समय यह ब्रह्मगवी (क्रव्यात् अग्निः भूत्वा) = कच्चा मांस खा-जानेवाली अग्नि बनकर (ब्रह्मज्यं प्रविश्य अत्ति) = ब्रह्म की हानि करनेवाले में प्रवेश करके उसे खा जाती है। (अस्य) = इसके (सर्वा अङ्गा) = सब अङ्गों को (पर्वा) = पर्वों को-जोड़ों को व (मूलानि) = मूलों को (वृश्चति) = छिन्न कर देती है।
Essence
विनष्ट की गई ब्रह्मगवी विनाश का ही कारण बनती है।
Subject
सर्वविनाश