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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 12/5/4

5 Sukta
73 Mantra
12/5/4
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- अथर्वाचार्यः Chhanda- आसुर्नुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
ब्रह्म॑ पदवा॒यं ब्रा॑ह्म॒णोऽधि॑पतिः ॥

ब्रह्म॑ । प॒द॒ऽवा॒यम् । ब्रा॒ह्म॒ण: । अधि॑ऽपति: ॥५.४॥

Mantra without Swara
ब्रह्म पदवायं ब्राह्मणोऽधिपतिः ॥

ब्रह्म । पदऽवायम् । ब्राह्मण: । अधिऽपति: ॥५.४॥

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Meaning
१. यह ब्रह्मगवी [वेदधेनु] (स्वधया परिहिता) = [स्व-धा] आत्मधारणशक्ति से परिहित है समन्तात् धारण की गई है अथवा 'पितृभ्यः स्वधा' पितरों का आदर करने से यह प्राप्त होती है। (श्रद्धया पर्यूढा) = श्रद्धा से यह वहन की गई है। बिना श्रद्धा के इस वेदज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। (दीक्षया गुप्ताः) = व्रतग्रहण से यह रक्षित होती है, अर्थात् व्रतधारण करनेवाला व्यक्ति ही इसको अपने में सुरक्षित कर पाता है। (यज्ञे प्रतिष्ठिता) = यह यज्ञ में प्रतिष्ठित है, अर्थात् यज्ञमय जीवनवाला व्यक्ति इस ब्रह्मगवी का आदर कर रहा होता है। (लोको निधनम्) = यह संसार इसका घर है [Residence], अर्थात् इस वेदवाणी का प्रयोजन इस संसार-गृह को सुन्दर बनाना ही है। २. इस ब्रह्मगवी से दिया जानेवाला (ब्रह्म) = ज्ञान (पदवायम्) = [पद्यते मुनिभिर्यस्मात् तस्मात् पद उदाहतः] उस प्रभु को प्राप्त करनेवाला है [वा गती] (ब्राह्मणः) = एक ब्रह्मचारी (अधिपति:) = इस ज्ञान का अधिपति बनता है।
Essence
इस वेदवाणी की प्राप्ति के लिए 'स्वधा, श्रद्धा व दीक्षा' की आवश्यकता है। यज्ञमय जीवन से इसकी प्रतिष्ठा होती है। यह संसार ही इसका घर है-यह घर को सुन्दर बनाती है। इससे दिया गया ज्ञान हमें ब्रह्म को प्राप्त कराता है। हम इसके अधिपति 'ब्राह्मण' बनें|
Subject
स्वधा...श्रद्धा...दीक्षा