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Atharvaveda - Mantra 37

Atharvaveda 12/5/37

5 Sukta
73 Mantra
12/5/37
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- अथर्वाचार्यः Chhanda- आसुर्यनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
अव॑र्तिर॒श्यमा॑ना॒ निरृ॑तिरशि॒ता ॥

अव॑र्ति: । अ॒श्यमा॑ना । नि:ऽऋ॑ति: । अ॒शि॒ता॥८.१०॥

Mantra without Swara
अवर्तिरश्यमाना निरृतिरशिता ॥

अवर्ति: । अश्यमाना । नि:ऽऋति: । अशिता॥८.१०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (पिश्यमाना) = टुकड़े-टुकड़े की जाती हुई यह ब्रह्मगवी (क्रुद्धः शर्वः) = कुद्ध हुए-हुए प्रलंकार रुद्र के समान होती है। (पिशिता) = काटी गई होने पर (शिमिदा) = शान्ति व सुख को नष्ट करनेवाली होती है [दाप लवने]। (अश्यमाना) = खाई जाती हुई (अवर्तिः) = दरिद्रता व सत्ताविनाश का हेतु होती है और अशिता (निर्ऋति:) = खायी गई होकर पापदेवता व मृत्यु के समान भयंकर होती है। २. (अशिता ब्रह्मगवी) = खायी गई यह 'ब्रह्मगबी' (ब्रह्मज्यम्) = ज्ञान के विनाशक इस राजन्य को (अस्मात् च अमुष्मात् च) = इस लोक से और परलोक से-अभ्युदय व निःश्रेयस से (छिनत्ति) = उखाड़ फेंकती है।
Essence
वेदवाणी का प्रतिरोध प्रलयंकर होता है-यह शान्ति का विनाश कर देता है, दरिद्रता व दुर्गति का कारण बनता है तथा अभ्युदय व निःश्रेयस को विनष्ट कर देता है।
Subject
अभ्युदय व नि:श्रेयस का विनाश