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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 12/5/2

5 Sukta
73 Mantra
12/5/2
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- अथर्वाचार्यः Chhanda- भुरिक्साम्न्यनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
स॒त्येनावृ॑ता श्रि॒या प्रावृ॑ता॒ यश॑सा॒ परी॑वृता ॥

स॒त्येन॑ । आऽवृ॑ता । श्रि॒या । प्रावृ॑ता । यश॑सा। परि॑ऽवृता॥५.२॥

Mantra without Swara
सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृता ॥

सत्येन । आऽवृता । श्रिया । प्रावृता । यशसा। परिऽवृता॥५.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यह ब्रह्मगवी [वेदधनु] श्(रमेण तपसा सष्टा) = श्रम और तप के द्वारा उत्पन्न होती है। आलसी व आरामपसन्द को यह वेदवाणी प्राप्त नहीं होती। ब्रह्मचारी को परिश्रमी व तपस्वी होना ही चाहिए। यह वेदवाणी (ब्रह्मणा वित्ता) = ज्ञान के द्वारा प्राप्त होती है-समझदार विद्यार्थी ही इसे प्राप्त कर पाता है। (ऋते श्रिता) = यह ऋत में आश्रित है-जहाँ जीवन सूर्य व चन्द्र की भांति व्यवस्थित होता है, वहीं वेदज्ञान भी आश्रय करता है। २. यह ब्रह्मगवी (सत्येन आवृता) = सत्य से आवृत है, (श्रिया प्रावृता) = श्री से प्रावृत-खूब ही आवृत है और (यशसा परीवृता) = यश से चारों दिशाओं में आच्छादित है, अर्थात् ब्रह्मगवी को अपनानेवाला व्यक्ति सत्यवादी, श्रीसम्पन्न व यशस्वी बनता है।

 
Essence
वेदज्ञान को प्राप्त करने के लिए 'श्रम, तप, ब्रह्म-ज्ञान-समझदारी व अस्त-व्यवस्थित जीवन' की आवश्कता है और यह वेदज्ञान हमें 'सत्य, यश व श्री' को प्राप्त कराता है।
Subject
सत्यं यशः श्री: