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Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 12/5/14

5 Sukta
73 Mantra
12/5/14
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- अथर्वाचार्यः Chhanda- साम्न्युष्णिक् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
सर्वा॑ण्यस्यां क्रू॒राणि॒ सर्वे॑ पुरुषव॒धाः ॥

सर्वा॑णि । अ॒स्या॒म् । क्रू॒राणि॑। सर्वे॑ । पु॒रु॒ष॒ऽव॒धा: ॥७.३॥

Mantra without Swara
सर्वाण्यस्यां क्रूराणि सर्वे पुरुषवधाः ॥

सर्वाणि । अस्याम् । क्रूराणि। सर्वे । पुरुषऽवधा: ॥७.३॥

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Meaning
१. (सा एषा ब्रह्मगवी) = वह यह ब्रह्मगवी-ब्राह्मण की वाणी (आवृता) = निरुद्ध हुई-हुई (भीमा) = बड़ी भयंकर है। यह (अघविषा) = राष्ट्र में पाप के विष को फैलानेवाली है। (साक्षात् कृत्या) = यह तो स्पष्ट छेदन-भेदन [हिंसा] ही है। (कूल्बजम्) = [कु+उल दाहे+ज] यह ब्रह्मगवी का निरोध भूमि पर दाह को उत्पन्न करनेवाला है। २. (अस्याम्) = इस ब्रह्मगवी के निरुद्ध होने पर (सर्वाणि घोराणि) = राष्ट्र में सब घोर कर्म होने लगते हैं (च) = और (सर्वे मृत्यवः) = सब प्रकार के रोग उठ खड़े होते हैं। (अस्याम्) = इस ब्रह्मगवी के निरुद्ध होने पर (सर्वाणि कूराणि) = सब क्रूर कर्म होते हैं और (सर्वे पुरुषवधा:) = सब पुरुषों के वध प्रारम्भ हो जाते हैं-क़त्ल होने लगते हैं। ३. (सा) = वह (आदीयमाना) = [दाप् लवने] छिन्न की जाती हुई (ब्रह्मगवी) = ब्राह्मण की वाणी उस (ब्रह्मज्यम्) = ज्ञान का हिंसन करनेवाले, (देवपीयुम्) = देवों के हिंसक बलदृप्त राजन्य को (मृत्योः पड्बीशे) = मौत की बेड़ी में (आद्यति) = बाँधती है [आ-दो बन्धने]।
Essence
राष्ट्र में ब्राह्मण की वाणी पर प्रतिबन्ध लगाने से राष्ट्र में पाप, हिंसा व क्रूर कर्मों का प्राबल्य हो जाता है। अन्ततः यह प्रतिबन्धक राजा भी मृत्यु के पजे में फँसता है।
Subject
गायत्री आवृता ब्रह्मगवी