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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 12/4/6

5 Sukta
53 Mantra
12/4/6
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
यो अ॑स्याः॒ कर्णा॑वास्कु॒नोत्या स दे॒वेषु॑ वृश्चते। लक्ष्म॑ कुर्व॒ इति॒ मन्य॑ते॒ कनी॑यः कृणुते॒ स्वम् ॥

य: । अ॒स्या॒: । कर्णौ॑ । आ॒ऽस्कु॒नोति॑ । आ । स: । दे॒वेषु॑ । वृ॒श्च॒ते॒ । लक्ष्म॑ । कु॒र्वे॒ । इति॑ । मन्य॑ते । कनी॑य: । कृ॒णु॒ते॒ । स्वम् ॥४.६॥

Mantra without Swara
यो अस्याः कर्णावास्कुनोत्या स देवेषु वृश्चते। लक्ष्म कुर्व इति मन्यते कनीयः कृणुते स्वम् ॥

य: । अस्या: । कर्णौ । आऽस्कुनोति । आ । स: । देवेषु । वृश्चते । लक्ष्म । कुर्वे । इति । मन्यते । कनीय: । कृणुते । स्वम् ॥४.६॥

Meaning
१. (यः) = जो (अस्या:) = इस वेदवाणी के (कर्णौ आस्कुनोति) = [निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते] निर्वचनरूप कानों को आवृत किये रखता है, अर्थात् वेदशब्दों का निवर्चन नहीं करता, (सः) = वह (देवेषु) = विद्वानों में (आवृश्चते) = छिन्न हो जाता है। इस व्यक्ति का परिगणन विद्वानों में नहीं रहता, चूँकि निर्वचन के अभाव में यह वेदों का असंगत अर्थ करता है। २. जो व्यक्ति (लक्ष्म कर्वे इति मन्यते) = ऐसा समझता है कि मैं इस वेदवाणी को अपना 'चिह्न' [पदवी] बनाता है, अर्थात् जो वेदवाणी को पढ़ने के स्थान पर उसका आडम्बर अधिक करता है, वह (स्वं कनीयः कृणुते) = अपने बास्तविक ऐश्वर्य को न्यून करता है। दिखावे से उसकी वेदज्ञता कलंकित हो जाती है।
Essence
हमें निर्वचन द्वारा वेदशब्दों के मर्म को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। वेदजता के आडम्बर की अपेक्षा वेद को समझने का अधिक प्रयत्न करना चाहिए तभी हम देव बनेंगे।
Subject
वेदज्ञता के आडम्बर का अभाव

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