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Atharvaveda - Mantra 44

Atharvaveda 12/4/44

5 Sukta
53 Mantra
12/4/44
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
वि॑लि॒प्त्या बृ॑हस्पते॒ या च॑ सू॒तव॑शा व॒शा। तस्या॒ नाश्नी॑या॒दब्रा॑ह्मणो॒ य आ॒शंसे॑त॒ भूत्या॑म् ॥

वि॒ऽलि॒प्त्या: । बृ॒ह॒स्प॒ते॒ । या । च॒ । सू॒तऽव॑शा । व॒शा । तस्या॑: । न । अ॒श्नी॒या॒त् । अब्रा॑ह्मण: । य: । आ॒ऽशंसे॑त । भूत्या॑म् ॥४.४४॥

Mantra without Swara
विलिप्त्या बृहस्पते या च सूतवशा वशा। तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम् ॥

विऽलिप्त्या: । बृहस्पते । या । च । सूतऽवशा । वशा । तस्या: । न । अश्नीयात् । अब्राह्मण: । य: । आऽशंसेत । भूत्याम् ॥४.४४॥

Meaning
१. हे (बृहस्पते) = ज्ञानिन् ! (या च वशा) = जो कमनीया वेदवाणी निश्चय से (सूतवशा) = [नियन्ता सूतः] अपना नियमन करनेवाले के वश में होती है, (तस्याः) = उस (विलिप्त्या:) = हमारा विशेष उपचय करनेवाली वेदवाणी का (अब्रह्मण:) = अब्राह्मण वृत्तिवाला, अब्रह्मचारी (न अश्नीयात्) = नहीं उपभोग कर पाता, (यः) = जो (भूत्याम्) = ऐश्वर्य में (आशंसेत) = आशंसा-इच्छा करता है, जिसका जीवनोद्देश्य रुपया-पैसा हो जाता है, वह इस वेदवाणी को प्रास नहीं कर पाता।
Essence
वेदवाणी उसे प्राप्त नहीं होती जो ऐश्वर्य की कामनावाला हो जाता है तथा जो आत्मनियन्त्रण की शक्तिवाला नहीं होता।
Subject
नारद द्वारा उत्तर

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