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Atharvaveda - Mantra 35

Atharvaveda 12/4/35

5 Sukta
53 Mantra
12/4/35
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
पु॑रो॒डाश॑वत्सा सु॒दुघा॑ लो॒केऽस्मा॒ उप॑ तिष्ठति। सास्मै॒ सर्वा॒न्कामा॑न्व॒शा प्र॑द॒दुषे॑ दुहे ॥

पु॒रो॒डाश॑ऽवत्सा। सु॒ऽदुघा॑ । लो॒के । अ॒स्मै॒ । उप॑ । ति॒ष्ठ॒ति॒ । सा । अ॒स्मै॒ । सर्वा॑न् । कामा॑न् । व॒शा । प्र॒ऽद॒दुषे॑ । दु॒हे॒ ॥४.३५॥

Mantra without Swara
पुरोडाशवत्सा सुदुघा लोकेऽस्मा उप तिष्ठति। सास्मै सर्वान्कामान्वशा प्रददुषे दुहे ॥

पुरोडाशऽवत्सा। सुऽदुघा । लोके । अस्मै । उप । तिष्ठति । सा । अस्मै । सर्वान् । कामान् । वशा । प्रऽददुषे । दुहे ॥४.३५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. 'पुरः दाशति' आगे देता है, इसी से यह 'पुरोडाश' कहलाता है। यह पुरोडाश है प्रिय जिसको, ऐसी यह (पुरोडाशवत्सा) = आगे और आगे देनेवाले को प्यार करनेवाली यह वशा [वेदवाणी] (अस्मै) = इस पुरोडाश के लिए (लोके) = इस लोक में (सुदुघा) = उत्तम ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाली होती हुई (उपतिष्ठति) = उपस्थित होती है। २. उसके समीप उपस्थित होकर सा वशा-वह कमनीया वेदवाणी (अस्मै प्रददुषे) = इस वेदवाणी को औरों को देनेवाले के लिए (सर्वान् कामान्) = सब इष्ट पदार्थों को (दूहे) = प्रपूरित करती है।
Essence
वेदज्ञान को प्राप्त करके उस ज्ञान को ओरों को देनेवाला व्यक्ति ही वेदवाणी का प्रिय होता है। वेदवाणी अपने इस प्रिय के लिए सब इष्ट पदार्थों को प्राप्त कराती है।
Subject
पुरोडाशवत्सा