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Atharvaveda - Mantra 32

Atharvaveda 12/4/32

5 Sukta
53 Mantra
12/4/32
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- उष्ण्ग्बृहतीगर्भा Suktam- वशा गौ सूक्त
Mantra with Swara
स्व॑धाका॒रेण॑ पि॒तृभ्यो॑ य॒ज्ञेन॑ दे॒वता॑भ्यः। दाने॑न राज॒न्यो व॒शाया॑ मा॒तुर्हेडं॒ न ग॑च्छति ॥

स्व॒धा॒ऽका॒रेण॑ । पि॒तृऽभ्य॑: । य॒ज्ञेन॑ । दे॒वता॑भ्य: । दाने॑न । रा॒ज॒न्य᳡: । व॒शाया॑: । मा॒तु: । हेड॑म् । न । ग॒च्छ॒ति॒ ॥४.३२॥

Mantra without Swara
स्वधाकारेण पितृभ्यो यज्ञेन देवताभ्यः। दानेन राजन्यो वशाया मातुर्हेडं न गच्छति ॥

स्वधाऽकारेण । पितृऽभ्य: । यज्ञेन । देवताभ्य: । दानेन । राजन्य: । वशाया: । मातु: । हेडम् । न । गच्छति ॥४.३२॥

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Meaning
१. एक (राजन्य:) = अपनी प्रजाओं का रञ्जन करनेवाला राजा (पितृभ्यः स्वधाकारण) = पितरों के लिए स्वधा के द्वारा, अर्थात् पितृयज्ञ करने से, तथा (देवताभ्यः) = वायु आदि देवों की शुद्धि के लिए (यज्ञेन) = देवयज्ञ [अग्निहोत्र] के द्वारा तथा दानेन सब भूतों के हित के लिए अन्न आदि के देने के द्वारा, अर्थात् भूतयज्ञ [बलिवैश्वदेवयज्ञ] के द्वारा इस (मातुः) = जीवनों का निर्माण करने वाली (वशाया:) = कमनीया वेदवाणी के (हेडं न गच्छति) = निरादर को नहीं प्राप्त होता। २. जिस राष्ट्र में 'पितृयज्ञ, देवयज्ञ व भूतयज्ञ' आदि यज्ञों का आयोजन होता रहता है, उस राष्ट्र पर इस वशा माता की कृपा बनी रहती है। वेद के अनुसार चलता हुआ वह राष्ट्र फूलता-फलता रहता है।
Essence
एक राजा अपने राष्ट्र में 'पितृयज्ञ, देवयज्ञ व भूतयज्ञ' को प्रचलित करता हुआ वेदमाता का प्रिय बनता है। वेद उस राष्ट्र का सुन्दर निर्माण करता है।
Subject
पितृयज्ञ, देवयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ